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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
और कोई प्रश्न अब मेरे मुँह से नहीं निकला-बिल्कुल निस्तब्ध हो गया।
वैष्णवी खुद भी कुछ देर चुप रही। फिर हाथ जोड़कर बोली, “तुमसे विनती करती हूँ गुसाईं, एक बार मेरी शुरू की बातें सुन लो...”
“अच्छी बात है, कहो।”
पर जब कहने चली तो देखा कि कहना उतना आसान नहीं है। मेरी तरह मुँह नीचा किये हुए उसे भी काफी देर तक चुप रहना पड़ा। पर उसने हार नहीं मानी। अन्तर्द्वन्द्व में विजयी होकर जब उसने एक बार मुँह ऊपर उठाकर देखा तो मुझे भी ऐसा लगा कि उसके स्वाभाविक सुश्री चेहरे पर मानो एक खास चमक आ गयी है। बोली, “अहंकार मर कर भी नहीं मरता गुसाईं! हमारे बड़े गुसाईं कहते हैं कि यह मानो फूस की आग है जो बुझकर भी नहीं बुझती। राख हटाते ही नजर आता है कि धक-धक धधक रही है, पर इसीलिए इसे फूँक देकर बढ़ा तो नहीं सकती। फिर तो मेरा इस पथ पर आना ही मिथ्या हो जायेगा। सुनो। किन्तु औरत हूँ न, इसलिए शायद सब बातें खोलकर न भी कह सकूँ।”
मेरे संकोच की सीमा न रही। अन्तिम बार विनती कर कहा, “औरतों के पैर फिसलने के विवरणों में मुझे दिलचस्पी नहीं है, उत्सुकता भी नहीं, और उन्हें सुनना मुझे कभी अच्छा भी नहीं लगा कमललता। मुझे नहीं मालूम कि तुम्हारी वैष्णव-साधना में अहंकार के नाश के लिए कौन से मार्ग का निर्देश महाजनों ने किया है, पर अपने गुप्त पापों को अनावृत्त करने की स्पर्ध्दित विनय ही अगर तुम्हारे प्रायश्चित्त का विधान हो, तो तुम्हें अनेक-व्यक्ति मिल जाँयगे जिन्हें ऐसी सब कहानियाँ सुनना बहुत रुचिकर लगता है। मुझे माफ करो, कमललता, इसके अलावा मैं शायद कल ही चला जाऊँगा, शायद फिर जीवन में कभी हम लोगों की मुलाकात भी नहीं होगी।”
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