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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“उन्हें तुम नहीं जानतीं। गौहर बाप की तरह का नहीं है, उसे अपनी माँ का स्वभाव मिला है। इतना शान्त, अपने को भूला हुआ, ऐसा अच्छा मनुष्य कभी देखा है? उसकी माँ ऐसी ही थी। एक बार बचपन में गौहर के पिता के साथ उनके झगड़े की बात मुझे याद है। उन्होंने किसी को छिपाकर बहुत से रुपये दे दिये थे। इसी वजह से झगड़ा खड़ा हुआ। गौहर के पिता बदमिजाज आदमी थे। हम तो डर के मारे भाग गये। कुछ घण्टे बाद धीरे-धीरे आकर देखा कि गौहर की माँ चुपचाप बैठी हैं। गौहर के पिता के बारे में पूछने पर पहले तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। पर हमारे मुँह की ओर ताकते हुए वे एक बार खिलखिलाकर हँस पड़ीं। आँखों से पानी की कुछ बूँदें नीचे गिर पड़ीं। यह उनकी आदत थी।”
वैष्णवी ने प्रश्न किया, “इसमें हँसने की कौन-सी बात हुई?”
“हमने भी तो यही सोचा। पर जब हँसी रुक गयी तो वे धोती से आँखें पोंछ कर बोलीं, “मैं कैसी मूर्ख औरत हूँ बेटा! वे तो मजे से पेट भर कर खुर्राटे ले रहे हैं, और मैं बिना खाये उपवास कर गुस्से में जल-भुन रही हूँ, बताओ, इसकी क्या जरूरत है!” और इस कहने के साथ ही उनका सारा अभिमान और क्रोध धुल-पुँछकर साफ हो गया। यह भुक्तभोगी के अलावा और कोई नहीं जानता कि औरतों का यह कितना बड़ा गुण है!”
वैष्णवी ने प्रश्न किया, “तुम क्या भुक्तभोगी हो, गुसाईं?”
मैं कुछ सिटपिटा गया। यह नहीं सोचा था कि उसको छोड़कर यह प्रश्न मेरे ही सिर आ पड़ेगा। कहा, “सब क्या खुद ही भोगना पड़ता है कमललता, दूसरों को देखकर भी तो सीखा जाता है। इस मोटी भौंहों वाले आदमी के निकट क्या तुमने कुछ नहीं सीखा?”
वैष्णवी ने कहा, “पर वह तो मेरे लिए पराया नहीं है।”
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