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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
तो भी ऐसा लगता है कि इसमें विस्मय की कोई बात नहीं। रस की आराधना में आकण्ठ-मग्न रहते हुए भी उसकी एकान्त नारी-प्रकृति आज भी शायद रस का तत्व नहीं पा सकी है, वह असहाय अपरितृप्त प्रवृत्ति इस निरवच्छिन्न भाव-विलास के उपकरणों को संग्रह करने में शायद आज क्लान्त है- दुविधा से पीड़ित है। उसका वह पथभ्रष्ट विभ्रान्त मन अपने अनजान में ही न जाने कहाँ अवलम्ब खोजने में प्राणपण से जुटा हुआ है- वैष्णवी उसका पता नहीं जानती, इसीलिए आज वह बार-बार चौंककर अपने विगत-जन्म के रुद्ध द्वार पर हाथ फैलाकर अपराध की सान्त्वना माँग रही है। उसकी बातें सुनकर समझ सकता हूँ कि मेरे नाम 'श्रीकान्त' को ही पाथेय बनाकर आज वह अपनी नाव छोड़ देना चाहती है।
वैष्णवी चाय ले आयी। सब नयी व्यवस्था है, पीकर बहुत आनन्द मिला। मनुष्य का मन कितनी आसानी से परिवर्तित हो जाता है- अब मानो उसके खिलाफ कोई शिकायत नहीं!
पूछा, “कमललता, तुम क्या कलवार हो?”
कमललता ने हँसकर कहा, “नहीं, सुनार-बनियाँ। पर तुम्हारे निकट तो कोई प्रभेद नहीं है- दोनों ही एक हैं।”
“कम-से-कम मेरे निकट तो एक ही हैं। दोनों ही एक क्यों बल्कि सबके एक हो जाने पर भी कोई नुकसान नहीं।”
वैष्णवी ने कहा, “ऐसा ही तो लगता है। तुमने तो गौहर की माँ के हाथ का भी खाया है।”
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