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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“यह सुनकर यतीन के रोने का तो क्या कहना। वह मुझे देवता समझता था और दीदी कहकर पुकारता था। उसे कितना आघात, कितनी व्यथा हुई, उसकी आँखों का पानी जैसे खत्म ही नहीं होना चाहता था। बोला, “उषा दीदी, आत्मघात से बढ़कर और कोई महापाप नहीं है। एक पाप के कन्धों पर और एक जबरदस्त पाप लादकर तुम रास्ता खोजना चाहती हो? पर लज्जा से बचने का यह तरीका ही अगर तुमने स्थिर किया हो दीदी, तो मैं कभी मदद नहीं करूँगा। इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी तुम आदेश दोगी, उसका मैं तत्काल पालन करूँगा।” उसी के कारण मैं मर न सकी।
“क्रमश: पिताजी के कानों में बात पहुँची। वे जैसे निष्ठावान वैसे ही शान्त और निरीह प्रकृति के मनुष्य थे। मुझसे कुछ नहीं कहा, पर दु:ख से, शर्म से दो तीन दिन तक बिछौने से न उठ सके। फिर गुरुदेव के परामर्श से मुझे लेकर नवद्वीप आये। यह ठहरा कि मैं और मन्मथ दीक्षा लेकर वैष्णव हो जाँय और तब फूलों की माला और तुलसी की माला अदल-बदलकर नयी रीति से हमारी शादी हो। उससे पाप का प्रायश्चित होगा या नहीं, यह नहीं जानती थी, पर इस भरोसे पर कि जो शिशु गर्भ में आया है उसकी माँ होकर हत्या नहीं करनी पड़ेगी, मेरी आधी वेदना दूर हो गयी। उद्योग आयोजन होने लगा, दीक्षा कहो या भेष कहो, या और कुछ कहो, मेरा नया नामकरण हुआ- कमललता। किन्तु, तब भी यह मालूम नहीं था कि दस हजार रुपये देने का वचन देकर ही पिताजी ने मन्मथ को राजी किया है। पर एकाएक न जाने क्यों शादी का दिन आगे बढ़ा दिया गया- शायद एक सप्ताह। मन्मथ बहुत कम दिखाई पड़ता, नवद्वीप के मकान में मैं अकेली ही रहती थी। ऐसे ही कई दिन कट गये, इसके बाद फिर शुभ दिन आया। स्नान करके पवित्र होकर शान्त मन से ठाकुर की अर्पित माला हाथ में लिये प्रतीक्षा में बैठी रही। उदास चेहरे से पिताजी एक बार देख गये, पर मन्मथ को जब नवीन वैष्ण्व के वेष में देखा, तो अचानक सारे मन के भीतर बिजली दौड़ गयी। यह ठीक नहीं जानती कि वह आनन्द की थी या व्यथा की, शायद दोनों ही थी। पर इच्छा हुई कि उठकर उसके पैरों की धूल माथे पर लगा लूँ। पर शर्म के कारण ऐसा नहीं हो सका।
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