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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
वैष्णवी फिर क्षणभर मौन रहकर बोली, “एक घटना तुम्हें बताऊँगी, विश्वास करोगे? ठाकुरजी की ओर मुँह करके कहती हूँ कि तुमसे झूठ नहीं कहूँगी।”
मैंने हँसकर कहा, “करूँगा।”
“तो कहती हूँ। एक दिन गौहर गुसाईं के मुँह से सुना कि उनकी पाठशाला का एक मित्र उनके घर आया है। सोचा कि जो आदमी एक दिन भी यहाँ आए बिना नहीं रह सकता, वह अपने बचपन के मित्र के साथ छह-सात दिन कैसे भूला रहा? फिर सोचा कि यह कैसा ब्राह्मण मित्र है जो अनायास ही मुसलमान के घर पड़ा रहा, किसी से भी नहीं डरा? उसका क्या कहीं भी कोई नहीं है? पूछने पर गौहर गुसाईं ने भी ठीक यही बात कही। कहा कि संसार में उसका अपना कहने लायक कोई नहीं है, इसीलिए उसे डर नहीं है, चिंता भी नहीं है। मन-ही-मन खयाल किया कि ऐसा ही होगा। पूछा, गुसाईं, तुम्हारे मित्र का क्या नाम है? नाम सुनकर जैसे चौंक गयी। जानते तो हो गुसाईं, यह नाम मुझे नहीं लेना चाहिए।”
हँसकर बोला, “जानता हूँ। तुम्हारे मुँह से ही सुना है।”
वैष्णवी ने कहा, “पूछा, तुम्हारा मित्र देखने में कैसा है? उम्र क्या है? गुसाईं ने जो कुछ कहा उसका कुछ हिस्सा तो कानों में गया, और कुछ नहीं। पर हृदय के भीतर धड़कन होने लगी। तुम खयाल करते होगे कि ऐसा आदमी तो नहीं देखा तो नाम सुनकर ही पागल हो जाए। पर यह सच है। सिर्फ नाम सुनकर ही औरतें पागल हो जाती हैं गुसाईं!”
“उसके बाद?”
वैष्णवी ने कहा, “उसके बाद खुद भी हँसने लगी पर भूल न सकी। सब काम-काजों में मुझे केवल एक ही बात याद आने लगी कि तुम कब आओगे, तुम्हें अपनी आँखों से कब देख सकूँगी।”
सुनकर चुप रहा, पर उसके चेहरे की ओर देखकर हँस न सका।
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