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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
17
वैष्णवी ने आज मुझसे बार-बार शपथ करा ली कि उसका पूर्व विवरण सुनकर मैं घृणा नहीं करूँगा।
“सुनना मैं चाहता नहीं, पर अगर सुनूँ तो घृणा न करूँगा।”
वैष्णवी ने सवाल किया, “पर क्यों नहीं करोगे? सुनकर औरत-मर्द सब ही तो घृणा करते हैं।”
“मैं नहीं जानता कि तुम क्या कहोगी, तो भी अन्दाज लगा सकता हूँ। यह जानता हूँ कि उसे सुनकर औरतें ही औरतों से सबसे ज्यादा घृणा करती हैं, और इसका कारण भी जानता हूँ, पर तुम्हें वह नहीं बताना चाहता। पुरुष भी करते हैं, किन्तु बहुत बार वह छल होता है, और बहुत बार आत्मवंचना। तुम जो कुछ कहोगी उससे भी बहुत ज्यादा भद्दी बातें मैंने खुद तुम लोगों के मुँह से सुनी हैं, और अपनी आँखों भी देखी हैं। पर तो भी मुझे घृणा नहीं होती।”
“क्यों नहीं होती?”
“शायद यह मेरा स्वभाव है। पर कल ही तो तुमसे कहा है कि इसकी जरूरत नहीं। सुनने के लिए मैं जरा भी उत्सुक नहीं। इसके अलावा कौन कहाँ का है, यह सब कहानी मुझसे नहीं भी कही तो क्या हर्ज है?”
वैष्णवी काफी देर तक चुप हो कुछ सोचती रही। इसके बाद अचानक पूछ बैठी, “अच्छा गुसाईं, तुम पूर्वजन्म और अगले जन्मपर विश्वास करते हो?”
“नहीं।”
“नहीं क्यों? क्या तुम सोचते हो कि ये सब बातें सचमुच नहीं हैं?”
“मेरे सोचने के लिए दूसरी बहुत बातें हैं, शायद ये सब सोचने के लिए मुझे समय ही नहीं मिलता।”
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