लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


वैष्णवी ने कहा, “अभी तो कल शाम को ही तुम आये हो, पर आज इस संसार में मुझसे ज्यादा तुम्हें कोई प्रेम नहीं करता। पूर्वजन्म अगर सत्य न होता तो क्या एक दिन में यह असम्भव बात सम्भव हो सकती?”

कुछ ठहरकर उसने फिर कहा, “मैं जानती हूँ कि तुम रहने नहीं आये हो और रहोगे भी नहीं। चाहे जितनी भी प्रार्थना क्यों न करूँ, तुम दो-एक दिन बाद चले ही जाओगे। पर मैं केवल वही सोचती हूँ कि इस व्यथा को मैं कब तक सँभाले रहूँगी।” यह कहकर उसने सहसा आँचल से आँखें पोंछ डालीं।

मैं चुप हो रहा। इतने थोड़े-से समय में, इतनी स्पष्ट और प्रांजल भाषा में रमणी के प्रणय-निवेदन की कहानी इसके पहले न तो कभी किताब में पढ़ी थी और न लोगों की जुबानी ही सुनी थी। और अपनी आँखों से ही देख रहा हूँ कि यह अभिनय भी नहीं है। कमललता देखने में सुन्दर है, निरक्षर मूर्ख भी नहीं है, उसकी बात-चीत, उसका गाना, उसका आदर-प्यार और उसकी अतिथि-सेवा की आन्तरिकता के कारण वह मुझे अच्छी लगी है, और इस अच्छे लगने का प्रशंसा और रसिकता की अत्युक्ति से फैलाव करने में मैंने कंजूसी भी नहीं की है। पर देखते ही देखते यह परिणति इतनी गहरी हो जायेगी, वैष्णवी के आवेदन से, अश्रु-मोचन से और माधुर्य के उत्कंपठि‍त आत्मप्रकाश से सारा मन ऐसी तिक्तता से परिपूर्ण हो जायेगा- यह क्या क्षणभर भी पहले जानता था। मानो मैं हतबुद्धि हो गया। यही नहीं कि सिर्फ लज्जा से ही सारा शरीर रोमांचित हो गया हो, बल्कि एक प्रकार की अनजान विपद की आशंका से हृदय में अब कतई शान्ति और निराकुलता न रही। पता नहीं कि किस अशुभ मुहूर्त में काशी से चला था जो एक पूँटू का जाल तोड़कर दूसरी पूँटू के फन्दे में बुरी तरह फँस गया। इधर उम्र यौवन की सीमा लाँघ रही है, ऐसे असमय में अयाचित नारी-प्रेम की ऐसी बाढ़ आ गयी कि सोच ही न सका कि कहाँ भागकर आत्मरक्षा करूँ! कल्पना भी न की थी कि पुरुष के लिए युवती-रमणी की प्रणय-भिक्षा इतनी अरुचिकर हो सकती है। सोचा, एकाएक मेरा मूल्य इतना कैसे बढ़ गया? आज राजलक्ष्मी का प्रयोजन भी मुझमें शेष नहीं होना चाहता यही मीमांसा हुई है कि वह अपनी वज्रमुष्टि को जरा भी ढीला कर मुझे निष्कृति नहीं देगी। पर अब यहाँ और नहीं रहना चाहिए। साधु-संग सिर-माथे, यही स्थिर किया कि इस स्थान को कल ही छोड़ दूँगा।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book