|
ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
|||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती ने आश्चर्य में पड़कर पूछा, “क्यों भैया?”
डॉक्टर बोले, “यह चीन का अन्याय था-सम्राट सहसा बोल उठा,” अफीम खाते-खाते हमारी आंखें बंद होती जा रही हैं। बुद्धि-शुद्धि अब नहीं रही, कृपा करके इस चीज का आयात रोक दो।”
“इसके बाद?”
“इसके बाद का इतिहास बहुत ही संक्षिप्त-सा है। दो ही वर्ष के अंदर अफीम खाने को राजी होकर और भी पांच बंदरगाहों में केवल पांच रुपए प्रतिशत टैक्स पर व्यापार करने की स्वीकृति देकर और अंत में हांगकांग बंदरगाह दक्षिण में देकर सन् 42 में यह युद्ध समाप्त हुआ। ठीक ही हुआ। इतनी सस्ती अफीम पा कर जो मूर्ख खाने में आपत्ति करता है उसका ऐसा प्रायश्चित उचित ही तो था।
भारती बोली, “यह तुम्हारी मनगढ़ंत कहानी है।”
डॉक्टर बोले, “होने दो। कहानी सुनने में है तो अच्छी। और यही देखकर फ्रांसीसी सभ्यता ने कहा था-”मेरे पास अफीम तो नहीं लेकिन इन्सानों की हत्या करने के लिए अच्छे-से-अच्छे यंत्र अवश्य हैं। इसलिए युद्ध हुआ। फ्रांसीसियों ने चीन साम्राज्य का अनाम प्रांत छीन लिया और युद्ध का खर्च अधिक-से-अधिक व्यापारिक सुविधाएं, ट्रीटी-पोर्ट आदि- ये सब तुच्छ कहानियां हैं। इन्हें रहने दो।”
भारती बोली, “लेकिन भैया, ताली एक ही हाथ से बजती है? चीन का क्या कुछ भी अन्याय नहीं है?”
डॉक्टर बोले, “हो सकता है। लेकिन तमाशा तो यह है कि योरोपियन सभ्यता का अन्याय-बोध दूसरों के घरों पर चढ़ाई करने के लिए ही होता है। उनके अपने देश में ऐसी घटना दिखाई नहीं पड़ती।”
|
|||||











