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ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
अपने धर्म और धर्म-प्रचारकों के प्रति किए गए इन तीखे आक्षेप से दु:खी होकर भारती बोली, “यह बात मैं पहले भी सुन चुकी हूं। लेकिन जिन जापानियों के प्रति तुम भक्ति रखते हो वह कैसे हैं?”
डॉक्टर बोले, “यह झूठ है कि भक्ति रखता हूं। मैं उनसे घृणा करता हूं। कोरियावासियों को बार-बार बंधक और अभय देकर भी बिना दोष के झूठे बहाने गढ़कर उनके राजा को कैद करके सन् 1910 में जब जापान ने कोरिया राज्य हड़प लिया, मैं शंघाई में था। उस दिन के वह सब अमानुषिक अत्याचार भूल जाने के योग्य नहीं हैं। अभय क्या केवल जापान ने ही दिया था भारती? यूरोप ने भी दिया था। लेकिन शक्तिशाली जापान के विरुद्ध अंग्रेजों ने भी मुंह नहीं खोला। उसने कहा, हम लोग एंग्लो-जापानी संधि सूत्र में बंधे हुए हैं और यही बात संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति ने भी अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कह दी कि वचन देने से क्या हुआ? जो असमर्थ और शक्तिहीन राष्ट्र अपनी रक्षा नहीं कर सकता तो उसका राज्य नहीं जाएगा तो किसका जाएगा। ठीक ही हुआ। अब हम लोग जाएंगे उनका उद्धार करने? असम्भव है पागलपन है।” यह कहकर सव्यसाची ने एक पल चुप रहकर कहा-” मैं भी कहता हूं भारती कि यह असम्भव है, असंगत है, पागलपन है। दुर्बल का धन शक्तिशाली क्यों नहीं छीन लेगा? इस बात को सभ्य यूरोप की नैतिक बुद्धि सोच भी नहीं सकती।”
भारती अवाक् ही रही।
वह कहने लगे, अठारहवीं शताब्दी के अंतिम भाग में ब्रिटेन का दूत लार्ड मैकार्टनी गया चीनी दरबार में-व्यापर की थोड़ी-सी सुविधा प्राप्त करने के लिए। मंचू नरेश शिनलुंग उन दिनों समस्त चीन के सम्राट थे। वह अत्यंत दयालु थे। दूत की विनीत प्रार्थना से प्रसन्न होकर उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा, “देखो भैया, हमारे स्वर्ग जैसे साम्राज्य में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है, लेकिन तुम आए हो बहुत दूर से, अनेक कष्ट सहकर। जाओ, केंटन शहर में जाकर व्यापार करो। स्थान देता हूं। तुम सब लोगों का भला होगा।” राजा का यह आशीर्वाद निष्फल नहीं हुआ पचास वर्ष भी नहीं बीतने पाए कि चीन के साथ अंग्रेजों का प्रथम युद्ध छिड़ गया।”
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