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ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
“उसके बाद?”
“बता रहा हूं। जर्मन सभ्यता ने देखा-वाह रे वाह!-यह तो बड़ी मजेदार बात है। हम तो घाटे में ही रह गए....और उसने भी एक जहाज में पादरी भरकर उनके बीच लगा दिया। सन् 1697 में जब वे लोग प्रभु ईसा की महिमा, शांति और न्याय-धर्म का प्रचार कर रहे थे तब चीनियों का एक दल पागल हो उठा और उसने दो परम धार्मिक प्रचारकों के सिर काट डाले....अन्याय....चीन का ही अन्याय था। इसलिए शनटुंग प्रांत जर्मनी के पेट में चला गया। उसके बाद केंटन में विद्रोह हुआ। यूरोप की सभी सभ्यताओं ने एक होकर उसका जो बदला लिया शायद कहीं भी उसकी तुलना नहीं मिल सकती। उस हर्जाने का अपरिमित ऋण चीनी लोग कितने दिनों तक चुकाते रहेंगे यह बात ईसा प्रभु ही जानते हैं। इस बीच ब्रिटिश सिंह, जार के भालू, जापान के सूर्य देव-लेकिन अब नहीं बहिन, मेरा गला सूखता जा रहा है। दु:ख की तुलना में अकेले हम लोगों के सिवा शायद उन लोगों का और कोई साथी नहीं है सम्राट शिनटुंग निर्वाण को प्राप्त हों, उनके आशीर्वाद की बड़ी महिमा है।”
भारती एक बहुत लम्बी सांस खींचकर चुप हो रही।
“भारती।”
“क्या है भैया?”
“चुप क्यों हो?”
“तुम्हारी कहानी की ही बात सोच रही हूं। अच्छा भैया, इसीलिए क्या चीन में तुमने अपना कार्य-क्षेत्र चुना है? जो लोग सैकड़ों अत्याचारों से जर्जरित हैं उनको उत्तेजित कर देना कठिन नहीं है। लेकिन एक बात और है। इस पर क्या तुमने विचार किया है? उन सब निरीह अज्ञानी किसान-मजदूरों का दु:ख तो यों ही यथेष्ट है। उस पर फिर मार-काट, खून-खराबी, शुरू कर देने से तो उनके दु:खों की सीमा नहीं रहेगी।”
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