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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


भारती ने चीखकर उन्हें रोकना चाहा, लेकिन उसके गले से एक अस्फुट शब्द के अतिरिक्त और कुछ नहीं निकला।

सव्यसाची का वह धीमा संयत कंठ स्वर पहले ही कभी अंतर्हित हो चुका था। बोला, “तुम ईसाई हो। तुम्हें याद है, एक दिन कौतूहल वश तुमने यूरोप की ईसाई सभ्यता का स्वरूप जानना चाहा था। उस दिन व्यथा पहुंचने के भय से मैंने नहीं बताया था। लेकिन आज बताता हूं। तुम लोगों की पुस्तक में क्या है, मैं नहीं जानता। सुना है, अच्छी बातें बहुत हैं। लेकिन बहुत दिनों तक एक साथ रहने से उनका वास्तविक स्वरूप मुझसे छिपा नहीं है। लज्जाहीन, नग्न स्वार्थ और पाशविक शक्ति की प्रधानता ही उसका मूलमंत्र है। सभ्यता के नाम पर दुर्बलों और असमर्थों के विरुद्ध मनुष्य की बुद्धि ने इससे पहले इतने भयंकर और घातक मूसल का आविष्कार नहीं किया था। पृथ्वी के मानचित्र की ओर आंख उठाकर देखो, यूरोप की विश्व-ग्रासी भूख से कोई भी दुर्बल जाति अपनी रक्षा नहीं कर पाती। देश की मिट्टी, देश की सम्पदा से देश की संतान किस अपराध से वंचित हुई? तुम जानती हो भारती, एक मात्र शक्ति-हीनता के अपराध से। फिर भी न्याय धर्म ही सबसे बड़ा धर्म है और विजित जाति के अशेष कल्याण के लिए ही अधीनता की जंजीर उसके पैरों में डालकर उस पंगु का हर प्रकार का उत्तरदायित्व ढोते रहना ही योरोपियन सभ्यता का परम कर्त्तव्य है। इस परम असत्य का लेखों, भाषणों, मिशनरियों के धर्म-प्रचार में, लड़कों की पाठय-पुस्तकों के द्वारा प्रचार करना ही तुम लोगों की अपनी सभ्यता की राजनीति है।

भारती मिशनरियों के बीच ही इतनी बड़ी हुई है। अनेक महान चरित्र उसने वास्तव में अपनी आंखों से देखे हैं। विशेष रूप से अपने धार्मिक विश्वास पर इस प्रकार से अकारण आक्रमण से व्यथित होकर बोली, “भैया, जिस धर्म का प्रचार करने के लिए जो लोग इस देश में आए हैं, उन लोगों के संबंध में मैं तुमसे बहुत अधिक जानती हूं। उन लोगों के प्रति आज तुम निरपेक्ष भाव से विचार नहीं कर पा रहे हो। योरोपियन सभ्यता ने क्या तुम लोगों की भलाई नहीं की? सती-दाह की प्रथा, गंगा सागर में संतान विसर्जन....।”

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