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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


डॉक्टर चुपचाप नाव खेते रहे। विलम्ब देखकर भारती के मन में यह विचार आया कि शायद वह इसका उत्तर नहीं देना चाहते। उसने हाथ बढ़ाकर नदी के पानी से मुंह धो डाला। अपने आंचल से अच्छी तरह पोंछकर फिर न मालूम वह क्या प्रश्न करने जा रही थी कि डॉक्टर बोल उठे, “एक तरह के ऐसे सांप होते हैं भारती, जो सांप खाकर ही जीते हैं। तुमने देखे हैं?”

भारती ने कहा, “नहीं, देखे नहीं। केवल सुना है।”

डॉक्टर बोले, “पशुशाला में हैं। एक बार कलकत्ते जाकर अपूर्व को आदेश देना, वह दिखा देगा।”

“मजाक मत करो भैया, अच्छा नहीं होगा।”

“अच्छा नहीं होगा, मैं भी यही कह रहा हूं। उनका पास-पास रहना ठीक नहीं होता, लेकिन विश्वास न हो तो चिड़िया घर के इंचार्ज से पूछ लेना।”

भारती चुप ही रही। डॉक्टर बोले, “तुम उन लोगों के धर्म को मानती हो। उनकी ऋणी हो। उनके अनेक सद्गुण तुमने अपनी आंखों से देखे हैं। लेकिन क्या तुमने देखा है उनकी विश्व को हड़प लेने वाली विराट भूल का परिणाम?” वह लोग इस देश के स्वामी हैं। आज ब्रिटिश सम्पत्ति की तुलना नहीं की जा सकती। कितने जहाज, कितने कल-कारखाने, कितनी हजारों-लाखों इमारतें। मनुष्यों को मार डालने के उपकरणों और आयोजनों का अंत नहीं है। अपने समस्त अभावों और हर प्रकार की आवश्यकताओं को मिटाकर भी अंग्रेजों ने सन् 1910 से लेकर सत्रह वर्षों तक बाहरी देशों को ऋण दिया था - तीन हजार करोड़ रुपए। जानती हो, इस विराट वैभव का उद्गम कहां है? अपने को तुम बंग देश की लड़की बता रही थी न? बंगाल की मिट्टी, बंगाल की जलवायु, बंगाल के मनुष्य, तुम्हारे लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं न? इसी बंगाल की दस लाख नर-नारी प्रति वर्ष मलेरिया से मर जाते हैं। एक युद्धपोत का मूल्य कितना होता है-जानती हो? उनमें से केवल एक के ही खर्च से कम-से-कम दस लाख माताओं के आंसू पोंछे जा सकते हैं। कभी तुमने इस बात पर भी विचार किया है? शिल्प गया, व्यापार गया, धर्म गया, ज्ञान गया - नदियों की छाती सूखकर मरुस्थल बनती जा रही है। किसान को भर पेट खाने को अन्न नहीं मिलता। शिल्पकार विदेशियों के द्वार पर मजदूरी करता है। देश में जल नहीं, अन्न नहीं। गृहस्थ की सर्वोत्तम सम्पदा गोधन भी नहीं। दूध के अभाव में उनके बच्चों को मरते देखा है भारती?”

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