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ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “नहीं। प्रायश्चित शब्द क्या केवल मुंह से कहने के लिए ही है? हमारे पूर्वज-पितामहों के युगों से संचित किए गए पापों का अपरिमेय स्तूप कैसे समाप्त होगा - बता सकती हो? करुणा की अपेक्षा न्याय-धर्म बहुत बड़ी चीज है भारती।”
भारती बोली, “यहां तुम्हारी पुरानी बात है भैया। भारत की स्वतंत्रता के संबंध में रक्तपात के अतिरिक्त और कुछ जैसे तुम्हारे मन में आ ही नहीं सकता, रक्तपात का उत्तर क्या रक्तपात ही हो सकता है? और उसके उत्तर में भी तो रक्तपात के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता। यह प्रश्नोत्तर तो आदम काल से ही होता चला आ रहा है। तब क्या मानव सभ्यता इससे बड़ा उत्तर किसी दिन दे नहीं सकेगी? देश चला गया। लेकिन उससे भी बड़ा जो मनुष्य है वह तो आज भी मौजूद है। मनुष्य-मनुष्य के साथ आपस में लड़ाई-झगड़ा न करके क्या किसी तरह रह नहीं सकते?”
डॉक्टर बोले, “एक अंग्रेज कवि ने कहा है कि पश्चिम और पूर्व किसी दिन भी नहीं मिल सकते।”
भारती बोली, “मूर्ख है वह कवि। कहने दो उसे। तुम ज्ञानी हो। तुमसे मैंने अनेक बार पूछा है, आज भी पूछ रही हूं। होने दो उन्हें पश्चिम या योरोप का मनुष्य। लेकिन है तो वह मनुष्य ही? मनुष्य के साथ मनुष्य क्या किसी प्रकार भी मित्रता नहीं कर सकता। भैया, मैं ईसाई हूं। अंग्रेजों की ऋणी हूं। उनके अनेक सद्गुण मैंने देखे हैं। उन लोगों को इतना बुरा सोचने पर मेरी छाती में शूल-सा बिंध जाता है। लेकिन मुझे गलत मत समझना भैया। मैं बंगाली लड़की हूं। तुम्हारी बहिन हूं। बंगाल की मिट्टी और बंगाल के मनुष्यों को अपने प्राणों से बढ़कर प्यार करती हूं। कौन जानता है, तुमने जिस जीवन को चुन लिया है, उसे देखते हुए शायद आज ही हम लोगों की अंतिम भेंट हो। शांत मन से आज उत्तर देते जाओ जिससे उसी ओर दृष्टि रखकर जीवन भर नजर उठाकर सीधी चल सकूं,” कहते-कहते उसका गला रुंध गया।
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