|
ई-पुस्तकें >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
|||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर बीच में ही रोककर बोल उठे, “चड़क पूजा के समय पीठ छेदना, संन्यासियों की तलवार पर उछल-कूद मचाना, डकैती, ठगी, विद्रोहियों का उपद्रव, गोड़ा और खासियों की आषाढ़ में नरबलि और भी बहुत से काम हैं जिनकी याद नहीं आ रही भारती।”
भारती ने एक शब्द भी नहीं कहा।
डॉक्टर बोले, “ठहरो, और भी दो बातें याद आ गईं। बादशाहों के जमाने में गृहस्थ लोग बहू-बेटियों और दासियों को अपने घरों में नहीं रख सकते थे। नवाब लोग स्त्रियों के पेट चीरकर बच्चों को देखा करते थे। हाय रे हाय, इसी तरह विदेशियों के लिखे इतिहास ने साधारण और तुच्छ बातों को विपुल और विराट बनाकर देश के प्रति देशवासियों के मन को विमुख कर दिया। मुझे याद है, अपने बचपन में स्कूल की पाठय-पुस्तक में मैंने पढ़ा था-विलायत में बैठकर केवल हम लोगों के कल्याण की चिंता में लगे रहकर राज्य मंत्री की आंखों की नींद और मुंह का अन्न नीरस हो गया है। यह असत्य लड़कों को रटना पड़ता है और पेट के लिए शिक्षकों को जबानी याद कराना पड़ता है और सभ्य राजतंत्र की यही राजनीति है भारती। आज अपूर्व को दोष देना व्यर्थ है।”
|
|||||











