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परसाई के राजनीतिक व्यंग्य

हरिशंकर परसाई

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :296
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9709
आईएसबीएन :9781613014189

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राजनीतिक विषयों पर केंद्रित निबंध कभी-कभी तत्कालीन घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए अपने पाठ की माँग करते हैं लेकिन यदि ऐसा कर पाना संभव न हो तो भी परसाई की मर्मभेदी दृष्टि उनका वॉल्तेयरीय चुटीलापन इन्हें पढ़ा ले जाने का खुद में ही पर्याप्त कारण है।


विधायकों की बिक्री


एक सज्जन बड़े दुख से कह रहे थे - सत्यवादी राजा हरिशचंद्र के देश में विधायक बिकने लगे। उनका इशारा था कुछ राज्यों में पिछले मध्यावधि चुनाव में बहुमत बनाने के लिए निर्दलीय विधायकों की खरीदी की खबरों पर। हम नहीं जानते ये विधायक वास्तव में खरीदे गए या नहीं। या किस कीमत पर। पर यह बात खूब फैली थी। हमारे देश में इस दौर में इस तरह की और इससे गिरी हुई खबरों का एकदम विश्वास कर लिया जाता है। सच बात में एकाएक विश्वास नहीं होता।

मैंने उनसे कहा - आप क्यों दुखी हैं। राजा हरिशचंद्र ने सपने में किसी ब्राह्मण को अपना राज्य दान कर दिया था। दूसरे दिन उसी शक्ल के ब्राह्मण को बुलवाया गया और उसे राजतिलक कर दिया गया। हरिशचंद्र किसी मुर्दा जलानेवाले ठेकेदार के यहाँ नौकर हो गए। मैं पूछता हूँ कि यह कितना बड़ा झूठ है और अन्याय भी कि किसी को सपने में देखा, उसे दान कर दिया। उसका नाम, पता आदि कुछ नहीं मालूम। मगर दूसरे दिन उस जैसे आदमी को राज्य सौंप दिया। राजा शासन तो करता है पर राज्य उसकी संपत्ति नहीं होती। राज्य में कितने लोग रहते हैं, उन्हें कैसे दान किया जा सकता है? हरिशचंद्र ने अन्याय ही तो किया। मुझे समझ में आता है कि उस जमाने में वचन की कीमत इतनी क्यों थी। तब न लेन देन की लिखा पढ़ी होती थी, न लेन देन के कानून थे, इकरारनामे नहीं थे, दस्तावेज नहीं थे, हुंडी नहीं थी, प्रोनोट नहीं थे। इसलिए प्रामाणिक हो गया कि वह शब्द कह दिया गया। इसीलिए 'प्राण जाए पर वचन न जाई' जैसी बातें कहीं जाती थी। लोगों के पास वचन के सिवा कोई प्रमाण नहीं था इसलिए वचन की इतनी ऊँची महत्ता हुई कि वह प्रमाण और गवाह हो गया। वचन का पालन करना धर्म हो गया। अब हरिशचंद्र को प्रापर्टी देना है तो अदालत जाकर रजिस्ट्री करवा सकते हैं। कहते हैं विधायक बिके। ये विधायक निर्दलीय थे। ये जिस दल में थे उसने उन्हें चुनाव टिकिट नहीं दी। उन्होंने दल छोड़ दिया और स्वतंत्र हो गए। दल बदलू कानून उन पर लागू नहीं होता क्योंकि उनका कोई दल नहीं है। प्रतिबद्धता का सवाल नहीं है। वे किसी भी दल में जा सकते हैं। विचारधारा या आदर्श का कोई सवाल नहीं है।

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