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परसाई के राजनीतिक व्यंग्य

हरिशंकर परसाई

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :296
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9709
आईएसबीएन :9781613014189

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राजनीतिक विषयों पर केंद्रित निबंध कभी-कभी तत्कालीन घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए अपने पाठ की माँग करते हैं लेकिन यदि ऐसा कर पाना संभव न हो तो भी परसाई की मर्मभेदी दृष्टि उनका वॉल्तेयरीय चुटीलापन इन्हें पढ़ा ले जाने का खुद में ही पर्याप्त कारण है।


अन्य भाषाओं में 'व्यंग्य'


व्यंग्य और विनोद लेखक माना जाता हूँ। दूसरी भाषाओं खासकर विदेशी भाषाओं के व्यंग्य-विनोद की किंचित झलक दिखाना चाहता हूँ। अंगरेजी से शुरू करता हूँ। पूरे योरप में यह माना जाता है कि अंगरेज मनहूस बनिए होते हैं। उन्हें हँसना नहीं आता। फ्रांसीसी तो कहते हैं - जानवर नहीं हँसा करते। अंगरेज को व्यंग्य में 'जानबुल' कहा जाता है। कार्टून बनता है एक तोंदवाला आदमी। इस तोंद में कई देश भरे हैं। यह अंगरेज साम्राज्यवाद का रूप है। बर्नार्ड शा का नाटक है- 'जान बुल्स अदर आई लैंड।'

संयोग कि किशोरावस्था में मेरे हाथ जो पहली विनोद की पुस्तक पड़ी वह अंग्रेज लेखक ए. जी. गार्डनर की थी। नाम था - अल्फा आफ दि प्लो। उसकी दूसरी पुस्तक पढ़ी - पेबल्स आन दी शोर। मुझे गार्डनर पसंद आया। एक लेख में उसका एक वाक्य है - वह पहिले दर्जे का उपदेशक था, जो रेल के पहिले दर्जे में मरा पाया गया - उसके जेब में तीसरे दर्जे का टिकिट था। कितना सटीक व्यंग्य है। उपदेशक वर्ग की अपनी नैतिकता पर। छोटे-छोटे एक दो वाक्यों में गार्डनर पूरे वर्ग का पाखंड खोल देता था। नैतिकता की बात उठी तो गार्डनर के एक लेख का जिक्र करूँ, जिसका नाम है- 'अंब्रेला मोरल्स'। (छाते की नैतिकता) आप दोस्त के घर बैठे हैं। पानी गिरने लगा और आपको घर लौटना है। मित्र आपको छाता दे देता है। छाता आपने वापस नहीं किया। ग्लानि मत कीजिए, अनैतिक होने का बोध मत लाइए। आपने मित्र का छाता दबाया या हड़पा नहीं है। आप छाता लौटाना भूल गए, बस। भूलना स्वभाव है आदमी का। यह नैतिक है। आपने छाता चुराया तो नहीं।

एक सज्जन इसी नैतिकता से बहुत सी किताबें जमा कर लेते हैं। पढ़ने के लिए किसी से लेते हैं और लौटाना भूल जाते हैं। एक दिन अपने एक मित्र को अपनी पुस्तकों का भंडार दिखाने ले जाते हैं। मित्र इतनी किताबें देख खुश होता है। पर किताबें खुले में रखी हैं। वह कहता है - इन्हें अलमारियों में रखिए। जवाब मिलता है - कोई आलमारी उधार नहीं देता।

अंगरेज विनोदी लेखकों में एक मैक्स बीरबोम हैं। बहुत नहीं लिखा। उनका एक लेख है - सीइंग पीपुल ऑफ। (लोगों को विदा देना) उसने लिखा है कि मुझे स्टेशन पर एक पुराना अभिनेता मिल गया। मैंने कहा - यहाँ कैसे? उसने कहा नया धंधा कर रहा हूँ। बात यह है कि रंगमंच पर कोई पूछता नहीं। पर अभिनय का जिंदगी भर का अभ्यास तो है ही। देखो अमेरिकी रईस औरतें इंगलैंड घूमने आती हैं। वे यहाँ बिलकुल अपरिचित होती हैं। वे चाहती हैं कि रेल गाड़ी पर हमें कोई विदाई दे। इससे उनका मनोबल बढ़ता है और डब्बे के यात्रियों पर प्रभाव पड़ता है कि इस अमेरिकी औरत के अपने लोग यहाँ हैं। वे विदा देनेवाले को काफी धन देती हैं। तो हम रिटायर्ड ऐक्टरों ने एक विदाई एजेंसी खोल ली है। खूब विज्ञापन कर दिया है। धंधा खूब चलता है। मैं यहाँ एक अमेरिकी युवती को विदा देने आया हूँ।

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