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परसाई के राजनीतिक व्यंग्य

हरिशंकर परसाई

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :296
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9709
आईएसबीएन :9781613014189

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राजनीतिक विषयों पर केंद्रित निबंध कभी-कभी तत्कालीन घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए अपने पाठ की माँग करते हैं लेकिन यदि ऐसा कर पाना संभव न हो तो भी परसाई की मर्मभेदी दृष्टि उनका वॉल्तेयरीय चुटीलापन इन्हें पढ़ा ले जाने का खुद में ही पर्याप्त कारण है।

महात्मा गाँधी की संगठन और विराट जन आंदोलन चलाने की क्षमता, विनम्रता, दृढ़ता, तार्किकता, नैतिकता, दुर्दम साहस, निष्ठा से साम्राज्यवादी डरते थे। वाइसराय लार्ड वेवेल के सचिव ने लिखा है - कि जब गाँधी के आने की खबर मिलती तो लार्ड वेवेल पत्ते की तरह काँपने लगते थे। जनरल वेवेल ने दूसरा महायुद्ध लड़ा था।

लेकिन सवाल व्यक्ति मोहनदास करमचंद गाँधी का नहीं है। वह व्यक्ति स्तुति और निंदा से परे कर दिया गया, तीस जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस को।

अब वह दुबारा क्यों मारा जा रहा है? अब उस आदमी से क्या डर है, और किन्हें डर है। वास्तव में डर है, उन सिद्धांतों, मूल्यों, मानवीयता, नैतिकताओं से जो गाँधीजी देश को दे गए। ये अभी भी प्रबल हैं। जनमानस में बैठे हैं। इन्हें मिटाना उद्देश्य है। इन्हें मिटाए बिना संकीर्ण राष्ट्रीयता, अमानवीय व्यवस्था अपसंस्कृति लाई नहीं जा सकती और लोकतंत्र की भावना को मिटाया नहीं जा सकता।

इसलिए महात्मा गाँधी का डर है। इसलिए उनकी हत्या को देशहित में उचित बताया जाता है। इतिहास का निर्णय देने का यह तरीका नहीं है। महात्मा गाँधी आलोचना से परे नहीं है। उनकी आलोचना की जा सकती है। उनकी औद्योगिक नीति की आलोचना उनके जीवन काल में भी हो सकती है। करना चाहिए। पर इतिहासदृष्टि यह होगी कि वह उस संपूर्ण युग को देखेगा, उन शक्तियों को समझेगा जो सक्रिय थीं, उन मूल्यों को देखेगा, जो राष्ट्रीय जीवन की बुनियाद माने गए। तब इतिहास मूल्यांकन करता है। इस भोंडे तरीके से नहीं।

गाँधीजी के विचार और मूल्य अब कितने संदर्भपूर्ण हैं। कुछ लोग उनके मान-मूल्यों, विचारों और सिद्धांतों को उपयोगी मानते हैं। पर पश्चिम के विचारक गाँधीजी पर फिर से विचार कर रहे हैं। अमेरिकी भविष्यवादी लेखक एल्विन टाफलर की किताब - 'फ्यूचर शाक ने काफी हलचल मचाई थी, उसके बाद की किताब 'थर्ड वेव' में एक अध्याय का नाम है- 'गाँधी विद सेटेलाइट्स।' गगनचुंबी इमारतें, सीमेंट, कांक्रीट के जंगल और मशीनी अमानवीयतावाले जीवन से घबराए आदमी को गाँधी की याद आएगी। सादा जीवन, प्रकृति से निकटता, मानवीयता के लिए गाँधी की शिक्षा अपनाई जाएगी।


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