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नीलकण्ठ

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :431
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9707
आईएसबीएन :9781613013441

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गुलशन नन्दा का एक और रोमांटिक उपन्यास

वह शब्द सुनते ही दोनों बहने सिर से पांव तक कांप गईं और मौन खड़ी उसे देखती रहीं।

'अच्छा आप पहले यह दवाई पी लें।' यह कहते संध्या ने चम्मच से दवाई आनंद के गले में उतार दी।

'बेला कहाँ है? उसे तो-’

'कुछ नहीं हुआ, बिल्कुल ठीक है, अभी बुलाती हूँ।'

'रहने दो', आनंद ने वहीं काट दिया। उसकी बात सुनकर बेला और पीछे हट गई और संध्या की ओर देखने लगी जो उसे निकट आने का संकेत कर रही थी।

आनंद थोड़ा रुककर फिर बोला-'बेचारी सो रही होगी, उसे नींद में न जगाना - बहुत ही लाडली है अपने माँ-बाप की, इसीलिए तो तुम्हें नर्स बनाकर स्वयं सो गई।'

'नहीं, ऐसा नहीं - वह तो बैठी आपकी प्रतीक्षा कर रही थी।'

संध्या ने लपककर बेला को खींचकर आनंद के सामने खड़ा कर दिया। वह उसकी भीगी उदास आँखों को देखकर कुछ गंभीर हो गया और धीरे से बोला-

'बेला तुम ठीक हो।'

'हाँ बिल्कुल ठीक - भाग्य को मेरी मृत्यु स्वीकार न थी।'

'यह क्या बक रही हो तुम', संध्या ने झट से कहा।

'सुना नहीं तुमने - मैं लाडली हूँ - इनकी सेवा नहीं कर सकती। इन्हें तुम्हारी असीसों की आवश्यकता है - मेरी नहीं, मैंने ही इन्हें तुम्हारे नीलकंठ से दूर जाने को उकसाया और उसका परिणाम-’ वह फूट-फूटकर रोने लगी।

संध्या ने उसे प्यार से अपनी बांहों में ले लिया और बोली-'पागल न बनो, देखो तो उनकी हालत, रही मैं - दो क्षण के लिए आई थी, जा रही हूँ, मुझे कहीं शीघ्र पहुँचना है, इनकी बातों का बुरा मान गईं, यह तो जिसे सामने देखते हैं उसी की प्रशंसा करने लग जाते हैं, यह तो इनका पुराना स्वभाव है।'

संध्या की आँखों से आंसू टपक पड़े और वह उन्हें आंचल से पोंछती बेला को सांत्वना देते हुए बाहर चली गई। आनंद ने उसे पुकारने का एक व्यर्थ प्रयत्न किया पर पीड़ा से कराह कर रह गया।

रात आधी से अधिक बीत गई और आनंद नींद की दवा पीकर सो गया, परंतु बेला की आँखों में नींद न आई। कई प्रकार के भयानक और उलझे हुए विचार उसके मस्तिष्क के पर्दे पर आकर चोटें लगाते रहे।

उसे अपने यौवन और अपनी सुंदरता पर घमण्ड था, पर आनंद का चंचल मन फिर संध्या की सराहना करने लगा। आखिर उसमें कौन सी ऐसी आकर्षण- शक्ति है जो हर थोड़े समय बाद आनंद को उधर ले जाती है।

उसे यों अनुभव होने लगा जैसे आनंद किसी समय भी उसे छोड़कर चला जाएगा - पर यह उसका भ्रम था, उसी के मन का चोर उसे भय की जंजीरों में जकड़े हुए था, वरना आनंद वह तो स्वयं उसका बंदी था।

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