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नीलकण्ठ

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :431
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9707
आईएसबीएन :9781613013441

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गुलशन नन्दा का एक और रोमांटिक उपन्यास

घर से बाहर आने वाले बरामदे में पहुँचते ही आनंद ने धड़ाम से कंधे पर लटकाया बिस्तर फर्श पर पटक दिया। एक धमाका हुआ और सीढ़ियों में बैठा दीनू चौंककर बोला-'छोटे सरकार आप।'

'चलिए, महिला सरकार!' आनंद ने बनावटी ढंग से कहा।

'पहले आप! आगे आतिथ्य करने वाला और पीछे अतिथि।' बेला ने पतले स्वर में उत्तर दिया। अंत में आनंद को आगे बढ़ना पड़ा और बेला इठलाती हुई पीछे हो ली।

दीनू ने जैसे ही सामान बरामदे में टिकाया रसोईघर से आनंद की माताजी ने पुकारा-’तो क्या दीनू अतिथि घर पर आ गए?'

'हाँ माँ जी!' झट से आनंद ने उत्तर दिया और रसोईघर की चौखट तक पहुँचते ही फिर कहने लगा-'परंतु वह अतिथि मैंने नहीं, बाबा ने भेजा है।' 'तो अपने बाबा से मिल आए?' वह चूल्हे में लकड़ी डालते हुए बोली। 'नहीं माँ, वह दीनू के साथ आई है।'

जैसे ही माँ ने आँखें उठाकर ऊपर देखा, बेला आनंद की पीठ पीछे से निकलकर सामने आ गई और हाथ जोड़कर झट से बोली-

'नमस्ते माँ जी!'

'नमस्ते बेटी! आओ, क्या तुम इसके साथ आई हो?'

'नहीं माँ जी, स्टेशन मास्टर साहब ने भेजा है। आज रात आपकी अतिथि हूँ।'

'सिर आँखों पर - आओ, भीतर आ जाओ। आनंद, दीनू से कह दो सामान भीतर ले आए।'

माँ रसोई घर से बाहर आ गई और बेला के सिर पर हाथ फेरती हुई प्यार से उसे अंदर ले गई।

थोड़े समय पश्चात् आनंद के बाबा भी आ गए। जब वह बेला की भेंट अपने पुत्र और पत्नी से कराने लगे तो यह सोचकर रुक गए कि अभी तक तो स्वयं उसका नाम नहीं जान पाए। बेला ने स्वयं अपना नाम लिया तो सब हँसने लगे। बेला ने अपना अभिनय अच्छी प्रकार निभाया और किसी पर स्पष्ट न होने दिया कि वह आनंद को पहले ही से जानती है।

बेला को विवशत: सबके संग दूसरी बार खाना खाना पड़ा। थोड़े ही समय में वह यूं घुल-मिल गई जैसे उसी का अपना घर हो। बेला के सोने का प्रबंध माँ जी ने कमरे में करवा दिया। आनंद को अपने बाबा के कमरे में सोना पड़ा। दोनों कनखियों से एक-दूसरे को देख लेते पर कुछ कह नहीं पाते। आनंद भी बाबा के सामने बिल्कुल मौन हो बैठा।

रात अधिक बीत चुकी थी। सब अपने-अपने बिस्तर पर आराम करने को जा लेटे थे परंतु बेला की आँखों में नींद न थी। वह बार-बार गर्दन टेढ़ी कर खुली खिड़की के बाहर देखती। पर वहाँ सरसराती हुई हवा के अतिरिक्त कुछ न था। एकाएक उसका मन इस विचार से गुदगुदा उठा-

'संभव है, आनंद भी अपने कमरे में लेटा उसी के विषय में कुछ सोच रहा हो।'

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