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नीलकण्ठ

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :431
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9707
आईएसबीएन :9781613013441

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गुलशन नन्दा का एक और रोमांटिक उपन्यास


चार

जैसे ही पूना एक्सप्रेस ने कल्याण का स्टेशन छोड़ा वैसे ही बेला ने चुपके डिब्बे में प्रवेश किया। आनंद द्वार की ओर पीठ पीछे किए कोई पत्रिका देख था। बेला ने किवाड़ बंद कर चिटखनी लगा दी।

आहट पाते ही आनंद ने पत्रिका को छोड़ अपनी गर्दन मोड़ी। बेला ने झट अपना मुँह मोड़ लिया और अपना सामान ठीक करने लगी। बेला सामने लगे दर्पण से आनंद की छाया को देख रही थी जो आश्चर्य से अपने सह-यात्री को देखने में संलग्न था।

बेला भी उलझन में थी, आनंद के समक्ष हो तो कैसे? नयन चार होते ही क्या होगा? इस समय अकेली कल्याण में क्या कर रही थी। आनंद की प्रतीक्षा - और यह सोचते ही वह सकुचा गई।

एकाएक उसे एक शरारत सूझी। उसने नीचे की सीट से अपना भारी-भरकम सूटकेस उठाया और उसे ऊपर की सीट पर रखने का व्यर्थ प्रयत्न करने लगी। 'छोड़िए, मैं रख देता हूँ।' सीट से उठते हुए आनंद ने कहा।

'जी।' यह कहते जैसे ही बेला ने पलटकर देखा तो आनंद भौंचक्का सा रह गया - बेला और यहाँ पर। कुछ इसी दशा के पश्चात् वह बोला-'बेला तुम यहाँ कैसे?'

'बेला?' धीमे स्वर में उसने कहा और फिर गंभीर होकर बोली-'बेला! वह कौन है?'

'बेला तुम! पर बंबई छोड़ अकेली यहाँ?'

'आप कदाचित भूल रहे हैं।'

'भूल कैसे?' आनंद ने सटपटाकर दो पग पीछे हटते हुए कहा।

'अथवा मुझे अकेले देखकर।'

'नहीं तो, किंतु आप?'

'मेरा नाम बेला नहीं, इन्द्रा है और मैं कल्याण से पूना जा रही हूँ।'

'ओह!' आनंद विस्मित-सा अपनी सीट पर जा बैठा। उसकी उत्सुक दृष्टि बार-बार बेला पर उठ जातीं। इतनी बड़ी भूल असंभव है, 'बेला-इन्द्रा यह क्या रहस्य है।' जब भी दोनों की दृष्टि मिल जाती आनंद सिहर उठता।

'किंतु आप मुझे यूं बार-बार क्यों देख रहे हैं।' आनंद को अधीर देख बेला झुंझलाकर बोली।

'नहीं तो - कुछ समस्या ही ऐसी आन पड़ी है। सच बात तो यह है कि-कि' कहते-कहते आनंद रुक गया और खिड़की से बाहर देखने लगा जहाँ गहन अंधकार को छोड़ कुछ न था।

'कहिए न चुप क्यों हो गए?' बेला ने कहा।

'मिस इन्द्रा! आपकी आकृति बिल्कुल बेला जैसी है। यदि आप उसे देखें तो समझेंगी कि स्वयं अपनी छाया ही दर्पण में देख रही हैं।'

'सच!' बेला अपनी सीट से उठी और आनंद के समीप बैठते हुए बोली-'क्या यह ठीक है कि मेरी आकृति आपकी बेला से मिलती है।'

'जी!' आनंद ने सिमटते हुए उत्तर दिया-'मुझे अभी तक विश्वास नहीं हो रहा कि आप वास्तव में इन्द्रा ही हैं।'

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