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नीलकण्ठ

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :431
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9707
आईएसबीएन :9781613013441

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गुलशन नन्दा का एक और रोमांटिक उपन्यास

एक झटके के साथ गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी। यात्रियों के शोर ने उसे भी जगा दिया - जैसे किसी सिनेमा-हॉल में फिल्म कट जाने से उसमें शोर हो उठता है।

बीन - कोई कह रहा था उसे ऐसा लगा जैसे उसके ठंडे शरीर पर किसी ने गर्म सलाख रख दी हो। उसने बाहर झांककर देखा। यह बीनापुर ही था। वही छोटा-सा स्टेशन, दो-चार गिने-चुने रेलवे बाबू और कुली - वर्षों से उसमें कोई बदली न आई थी और एक वह था जो चंद महीनों में ही इतना बदल गया था कि कोई उसे पहचान न सकता था। उसे ऐसा अनुभव हुआ जैसे बीनापुर की हर चीज उसे पहचानने का यत्न कर रही है और उसका उपहास कर रही है। बाबा जरा सामने से एक पान तो ले आना। किसी आवाज ने उसके विचारों का तांता तोड़ दिया। एक बुढ़िया ने इकन्नी बढ़ाते हुए उससे कहा। आनंद ने पान लेकर उसे दिया और बुढ़िया ने पान खाते हुए कागज को बाहर फेंकना चाहा पर खिड़की से टकराकर आनंद की गोद में आ पड़ा। आनंद ने कांपती हुई उंगलियों से कागज को खोला और झट से मसलकर बाहर फेंक दिया।

कागज पर बेला की तस्वीर छपी थी।

गाड़ी प्लेटफॉर्म छोड़कर सिगनल तक पहुँच चुकी थी। आनंद अपनी व्यग्रता को भूलने के लिए फिर बाहर झांककर देखने लगा - वही घूमती हुई धरती, ऊँचे-ऊँचे स्थल, आकाश पर मंडराते हुए बादलों के छोटे-छोटे टुकड़े - पर वह सब क्यों देखता है - उसकी भटकती आँखों को किसी की खोज थी वह कहीं दिखाई न देता था।

'कुली-कुली' की आवाजों से बंबई सेंट्रल का स्टेशन गूंज उठा। लोगों की भीड़ एक साथ बाहर निकलने लगी। आनंद ने अर्द्ध-निद्रा से आँखें खोलीं और फिर सो गया।

न जाने वह कितनी देर तक ऐसे ही सोया रहा कि किसी ने उसे चौंका दिया। टिकट चैकर उसे झिंझोड़कर टिकट पूछ रहा था। वह आँखें मलकर सीधा उठकर बैठ गया और जेब में हाथ डालकर उसने अपनी पूरी पूंजी बाहर निकाल ली - एक टिकट और पांच रुपये - यही उसकी अंतिम पूंजी थी। टिकट उसने चैकर के हाथों में दे दिया और नोट देखने लगा - उस नोट को जो कभी वह चपरासी को ईनाम में दिया करता था - आज उसके टिमटिमाते जीवन का अंतिम सहारा था।

'बंबई तो आ गई - तुम यहाँ बैठे क्या कर रहे हो?' टिकट लौटाते हुए बाबू ने पूछा।

'जी - ओह' उसने एक दृष्टि उस खाली डिब्बे में दौड़ाई जो थोड़े समय पहले यात्रियों से खचाखच भरा हुआ था और हड़बड़ाकर यों उठा जैसे अभी नींद में ही हो।

प्लेटफॉर्म पर उतरते ही उसने सामने लगी घड़ी को देखा। रात के दस बज चुके थे किंतु स्टेशन पर अभी गहमागहमी थी। बिजली के उजाले में रात में दिन हो रहा था। हर आदमी किसी धुन में व्यस्त था। आनंद सामने लोहे के जंगले से लगे बड़े-बड़े बोर्ड को देखकर रुक गया - अबकी बार वह चौंका नहीं - किसी नश्तर ने उसके मन में चुभन नहीं की - इन बातों का अब वह अभ्यासी हो गया था। बेला की इतनी लंबी-चौड़ी तस्वीर देखकर उसे लगा मानों वह स्वयं आकर खड़ी हो गई। क्षण-भर के लिए तो उसके सामने एक झनझनी-सी हुई किंतु फिर वह गंभीर हो गया और ध्यानपूर्वक उसे देखने लगा। वह एक समय पश्चात् उसे जी भरकर देख रहा था।

इतने में तेरह-चौदह वर्ष का एक काला-कलूटा लौंडा बगल में बूट पालिश का संदूक लगाए आगे बढ़ा और तस्वीर के पास आ खड़ा हुआ। जाने उसे क्या सूझा कि झट से काली पालिश का डिब्बा निकाला। उसने कुछ पॉलिश उंगली पर लगाई और बेला की मूंछें बना डालीं।

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