लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> नदी के द्वीप

नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :462
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706
आईएसबीएन :9781613012505

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

390 पाठक हैं

व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।


“क्यों? ओ-यह! नहीं भुवन, अधिक कुछ भी हो तो मुझे चुभता है - मैं अपने साथ ही जीना चाहती हूँ - बाहर का अनावश्यक लटा-पटा मुझसे सहा नहीं जाता।”

“और मैं मुगल बादशाह हूँ - क्यों?”

“वह तो मेहमान का कमरा है, डाक्टर साहब - आप हमारे मेहमान हैं।”

भुवन ने हाथ बढ़ाकर बिस्तर टटोला - तख्तों का पलंग, उस पर गद्दा नहीं था - दरी, नमदा, चादर; अचानक उसने तकिया एक ओर को खींचा, उसके नीचे एक कापी थी। उसने चुप-चाप तकिया वैसे ही रख दिया, मानो कापी न देखी हो।

“यहाँ बैठोगे, भुवन, या उधर चलें?'

“कहना तो यह चाहता हूँ कि मैं इधर रहूँगा, तुम उधर जाओ; पर - चलो, उधर बैठेंगे; क्योंकि मैं मेहमान हूँ!”

“हाँ!”

7


रेखा को उसने टेबल पर लैम्प के पासवाली कुरसी पर बिठाया, स्वयं पलंग पर बैठ गया। दोनों थोड़ी देर एक-दूसरे को देखते रहे।

“तुम-फिर आ गये, भुवन; मैंने नहीं सोचा था।”

“यह सोच लिया था कि अब नहीं आऊँगा?”

“नहीं भुवन, यह नहीं; पर आओगे, यह कभी नहीं सोचती थी।”

दोनों फिर थोड़ी देर चुप रहे।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book

A PHP Error was encountered

Severity: Notice

Message: Undefined index: mxx

Filename: partials/footer.php

Line Number: 7

hellothai