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नदी के द्वीप

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :462
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9706
आईएसबीएन :9781613012505

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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।

6


पहले दृग्मिलन के क्षण से कभी भी दोनों में किसी को यह नहीं लगा था कि उनका सम्पर्क कहीं टूट गया है और उसे फिर स्थापित करना होगा; बराबर ही वे सम्पृक्त थे। पर फिर भी, यद्यपि उन की बातों में घनिष्ट सौहार्द था, प्रणय था - मानो बात करने में दोनों यह भी अनुभव करते जा रहे थे कि वे बात नहीं कर रहे हैं, केवल पैंतरे कर रहे हैं...।

रात को भोजन के बाद - जिसमें रेखा ने लगभग कुछ नहीं खाया - रेखा उठकर अपने कमरे में चली गयी तो भुवन भी अपने कमरे में गया, कपड़े बदलकर उसने दो-एक चीज़ों को इधर-उधर करके अपनी सुविधा के अनुकूल रख लिया; फिर टेबल लैम्प को बहुत नीची मेज़ पर रख कर कि प्रकाश कमरे में बहुत मन्दा हो जाये, एक कुरसी उसने खींच कर लैम्प के पास कर दी। पलंग के सिरहाने की ओर खिड़की पर जाकर खड़ा हो गया और एकटक बाहर देखने लगा। बादल घिर आये थे, दूर की बिजली की प्रतिबिम्बित चमक से बादल की चादर रह-रह कर सफ़ेद हो आती थी।

रेखा का स्वर आया- ”मैं आ सकती हूँ? तुम्हारे कमरे में बैठ सकती हूँ?”

भुवन ने घूमकर कहा, “यह मैं पूछनेवाला था। आओ-पर तुम तो मुझे अपना कमरा दिखानेवाली थी।”

“चलो, अब चलो।”

साफ़-सुथरा और करीने से सजा तो था ही रेखा का कमरा, पर भुवन को लगा कि उसमें कुछ और भी विशेषता है। क्या, यह सहसा वह नहीं जान सका, पर थोड़ी देर में वह स्पष्ट हो गयी - कमरे में कोई चीज़ फ़ालतू नहीं थी। सब-कुछ मित, मानो आवश्यक होने के कारण अनिच्छा रहते भी रखा गया था। अपने कमरे से उसने तुलना की - वहाँ सब-कुछ अधिक था - अधिकतम आराम के लिए वह सजाया गया था; और यहाँ-अल्पतम आवश्यक सुविधा की ही कसौटी रखी गयी थी... उसने कहा, “रेखा, तुम तपश्चारिणी होने जा रही हो?”

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