ई-पुस्तकें >> नदी के द्वीप नदी के द्वीपसच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय
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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।
उसने बढ़ कर रेखा का हाथ थाम लिया, और मानो राह दिखाता हुआ साथ ले चला। सामने पेड़ के ऊर्ध्व भाग पर धूप पड़ रही थी, उसमें जगमग एक फलों-लदी डाली को दिखा कर भुवन ने कहा, “इस जाति का नाम बता सकती हो?”
रेखा कहने को थी, “क्विंस-” पर भुवन ने इशारे से टोकते हुए कहा, “ये हैं “सन-सेट ग्लोरी'।”
“सो तो जानती हूँ।” रेखा ने मुग्ध भाव से उसके कोट की आस्तीन से सिर छुआते हुए कहा, “मेरा सारा बग़ीचा 'सनसेट ग्लोरी' है।”
“देखो हम हारे नहीं रेखा; ढलते सूर्य को हमने पकड़ा ही नहीं, उसके बीच में खड़े हैं।”
रेखा ने फिर वह गहरा अपांग उसे दिया : “क्या जाने, भुवन; पर तुम कहते हो तो-ऐसा ही हो, ओ मेरे मालिक, ऐसा ही हो...” दोनों खड़े देखते रहे। सूर्य की कान्ति फीकी पड़ी, फिर डाली के फल स्याह हो गये, आलोक का धान्य मानो बादल के एक बहुत बड़े तामलोट में बन्द हो गया, तामलोट भी काला पड़ गया, हवा चलने लगी, रेखा सिहर गयी। भुवन ने अपनी बाँह पर पड़ी शाल रेखा को ठीक से ओढ़ा दी। रेखा ने कहा, “चलो अब चले-”
“हाँ, चलें - बैठकर बात करेंगे - मुझे बहुत-कुछ कहना है।”
“कहना है, भुवन-क्या कहना है?” रेखा उसकी ओर घूम गयी। दोनों की आँखें मिलीं। देर तक मिली रहीं। फिर दोनों चुप-चाप चलने लगे। भुवन ने धीरे से कहा, “नहीं, ठीक कहना नहीं है - कहना कुछ नहीं है। लेकिन...” वह सहसा चुप हो गया। पर मन-ही-मन वह कहता रहा, “रेखा, रेखा, रेखा...”
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