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आचार्य श्रीराम शर्मा >> क्या धर्म क्या अधर्म

क्या धर्म क्या अधर्म

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :82
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9704
आईएसबीएन :9781613012796

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धर्म और अधर्म का प्रश्न बड़ा पेचीदा है। जिस बात को एक समुदाय धर्म मानता है, दूसरा समुदाय उसे अधर्म घोषित करता है।


रसोई करने के लिए लकड़ी धोकर काम में लानी चाहिए या नहीं? नल का पानी पीना चाहिए या नहीं? कपड़े पहनकर भोजन करना चाहिए या नहीं? अमुक व्यक्ति को छूकर स्नान करना चाहिए या नहीं? रात्रि में भोजन करना चाहिए या नहीं? पानी छानकर पीना चाहिए या नहीं? अमुक के घर रसोई ग्रहण करनी चाहिए या नहीं? आदि प्रश्नों का उत्तर देने में हम बिल्कुल असमर्थ हैं, यह बातें किसी स्वास्थ्यविज्ञानी से पूछनी चाहिए, क्योंकि इन खान-पान सम्बन्धी बातों का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है बल्कि यह सब प्रश्न स्वास्थ्यविज्ञानी की अपेक्षा करते हैं। एक समय था जब कानूनों की सीमा छोटी थी और धर्मशास्त्र के अन्तर्गत स्वास्थ्य, समाज, राजनीति, गृहस्थ, अर्थशास्त्र आदि सब बातें आ जाती थीं। आज यह व्यवस्था बदल गई है। धर्म को हम अध्यात्म-शास्त्र या योगशास्त्र कहते हैं जो कि अपरिवर्तनशील है। अन्य नियमोपनियम देश, काल की अपेक्षा करते हैं इसलिए उन्हें भौतिक भूमिका में लाकर स्वतंत्र शास्त्र बना दिया गया है। यद्यपि उन पर अंकुश धर्म का ही है इसलिए अब खान-पान, शौच-स्नान का प्रश्न स्वास्थ्यविज्ञान की आधारशिला पर स्थिर होना चाहिए। यदि कोई प्राचीन धर्म पुस्तक कहती है कि ब्राह्मण के हाथ का भोजन ठीक है किन्तु स्वास्थ्यविज्ञान कहता है कि गन्देपन, बीमार या बुरी आदतों के कारण अमुक व्यक्ति के हाथ का भोजन नहीं करना चाहिए तो हम आपको स्वास्थ्यविज्ञान का निर्णय मानने की ही सम्मति देंगे। नल का पानी, कच्ची-पक्की रसोई, छुआछूत इन बातों को स्वास्थ्य शास्त्र का आदेश ही माननीय है। अध्यात्म-शास्त्र इन मामलों में बहुत उदार है और वह अकारण अधिक प्रतिबन्ध एवं संकीर्णता में मनुष्य जाति को फँसाने की इच्छा नहीं करता। इसी प्रकार लड़की-लड़कों का विवाह किस उम्र में करना चाहिए? यह प्रश्न स्वास्थ्य से ही सम्बन्ध रखता है। जिस आयु में संतानोत्पादन की स्वाभाविक आवश्यकता होती है, उस उम्र में विवाह होना चाहिए। जिस आयु में काम-विकारों को भड़काने की नहीं वरन् बालकों को उससे बचाने की आवश्यकता होती है, उस आयु में विवाह करने की आज्ञा कोई धर्मशास्त्र नहीं दे सकता।

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