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आचार्य श्रीराम किंकर जी >> चमत्कार को नमस्कार

चमत्कार को नमस्कार

सुरेश सोमपुरा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :230
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9685
आईएसबीएन :9781613014318

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यह रोमांच-कथा केवल रोमांच-कथा नहीं। यह तो एक ऐसी कथा है कि जैसी कथा कोई और है ही नहीं। सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में नहीं। यह विचित्र कथा केवल विचित्र कथा नहीं। यह सत्य कथा केवल सत्य कथा नहीं।

चौदह

मोहमाया के धागे

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सुबह तड़के सोचा कि मन्दिर से निकलकर चौगान में घूमूँ। मन्द रोशनी में देखा कि रेड-क्रॉस की एम्बुलेन्स गाड़ियों और लॉरियों से चौगान भर गया है। एक ओर तम्बू खड़े किये गये थे। बड़ी शान्ति से, जरा भी आवाज किए बगैर, अनेक परछाइयाँ घूम रही थीं, तम्बुओं के निकट जाकर मैंने देखा। जमीन पर फैले बिस्तरों पर कई सैनिक पड़े हुए कराह रहे थे। फौजी पोशाकें पहने डाँक्टर उनकी सेवा में व्यस्त थे।

पीछे से कन्धे पर हाथ रखकर किसी ने मुझे चौंका दिया। वह भारी हाथ गुरुदेव का ही था, यह मैंने स्पर्श के साथ समझ लिया। 'ज्यादा परेशान होना अच्छा नहीं। उनकी शान्त, परिचित आवाज मैंने सुनी।

उनसे मुखातिब होकर मैं नम्रता से खड़ा रह गया। उनके सामने किसी भी बात का खुलासा करने की जरूरत ही क्या थी?

''घूमने चलोगे? '' उन्होंने पूछा।

सहमति में सिर हिलाकर मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। रास्तों पर सन्नाटा छाया था।

''परेशान क्यों हो? '' गुरुदेव ने पूछा।

''आप तो सर्वज्ञ हैं।''

''तुम उस नौजवान के बारे में........ अम्बिका के भाई के बारे में.... सोच रहे हो।'' है न?

''जी हाँ।'' मैंने रोमांचित होकर पूछा, ''कौन है वह? सबसे पहले उसी ने मुझे दीदी के बारे में बताया. था। उसने दावा किया कि अम्बिकादेवी उसकी बहन है। जबकि... दीदी ने कहा कि वह तो उसे जानती तक नहीं।''

चैतन्यानन्द जी बच्चों की तरह खिलखिलाकर हँस पड़े। बोले, ''यह ममता का चमत्कार है। मोह, माया, ममता, लोभ... इन्हें छोड़ना आसान है क्या? तुम्हारी यह जो दीदी है, यह मेरे सभी शिष्यों में श्रेष्ठ है, किन्तु इसी अम्बिका से मैं मोह, माया, ममता, क्रोध. लोभ इत्यादि का त्याग न करवा सका। दूसरों का क्या कल्याण मैं कर सकता होऊँगा?''

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