ई-पुस्तकें >> श्रीमद्भगवद गीता - भावप्रकाशिनी श्रीमद्भगवद गीता - भावप्रकाशिनीडॉ. लक्ष्मीकान्त पाण्डेय
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गीता काव्य रूप में।
तुम सबके गुरु हो पूजनीय, चर-अचर जगत के तुम्हीं पिता।
तुमसे बढ़ कोई और कहाँ, त्रिभुवन में ना कोई समता।।४३।।
पाऊँ प्रसन्नता प्रभुवर की, स्वीकारो प्रणति प्रणाम नाथ।
ज्यों पिता-पुत्र, या मित्र-मित्र, प्रिय-प्रिया करें व्यवहार साथ।।४४।।
यह रूप नहीं पहले देखा, हर्षित पर मन को मिले त्रास।
अब देव रूप निज दिखला दो, कर कृपा विनय यह जग निवास।।४५।।
हो शीश मुकुट कर गदा, चक्र यह रूप चर्तुभुज लखूँ अहा।
हे सहसबाहु, हे विश्वमूर्ति, मैं यही देखना चाह रहा।।४६।।
प्रभु बोले, हो अतिशय प्रसन्न, यह विश्व रूप दिखलाया है।
यह आदि अन्त से परे तेजमय कोई देख न पाया है।।४७।।
जो वेद, यज्ञ, अध्ययन, दान, तप करने वाले हैं जन ये।
यह रूप तुम्हें जो दिखलाया, ना उसको देख सके हैं ये।।४८।।
इसलिए देखकर विश्व रूप, ना मूढ़ बनो, ना घवराओ।
निर्भय प्रसन्न होकर अर्जुन, अब विष्णु रूप दर्शन पावो।।४९।।
संजय बोले, कर कृपा पुन: निज रूप चतुर्भुज दिखलाया।
फिर से नर रूप धार करके, प्रभु ने अर्जुन को समझाया।।५०।।
अर्जुन बोले, यह मनुज रूप लख मेरा चित्त हुआ स्थिर।
अपनी नैसर्गिक स्थिति को अब प्राप्त कर लिया मैंने फिर।।५१।।
प्रभु बोले, अर्जुन दिखलाया, मैंने जो दुर्लभ रूप अभी।
इसका ही .दर्शन नित्य मिले, यह इच्छा करते देव सभी।।५२।।
पर वेद, यज्ञ, तप दान किये भी कोई देख नहीं पाता।
जैसा तुमको दिखलाया है, वह कहाँ, किसी को दिखलाता।।५३।।
हे पार्थ, अनन्य भक्ति का है, हो जाता जिस जन में निवेश।
जानता, देखता वही भक्त, फिर करता है मुझमें प्रवेश।।५४।।
हे भारत, कर्म हमारे हों, मुझमें मन हो, मुझसे नाता।
आसक्ति रहित हो वैर रहित, वह भक्त सदा मुझको भाता।।५५।
काल-गाल में सब पड़े, अर्जुन क्यों घबराय।।
कारण केवल पार्थ तुम, मरे हुए सब बीर।
लड़ो पाप कुछ भी नहीं, क्यों हो रहे अधीर।।
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