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पौराणिक कथाएँ

स्वामी रामसुखदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :190
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9593
आईएसबीएन :9781613015810

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नई पीढ़ी को अपने संस्कार और संस्कृति से परिचित कराना ही इसका उद्देश्य है। उच्चतर जीवन-मूल्यों को समर्पित हैं ये पौराणिक कहानियाँ।

राजाने पुत्रों और कन्याके बन्धन-युक्त होनेसे निराश होकर अपने नगरमें भी उपर्युक्त घोषणा करा दी। उस घोषणाको शस्त्रविद्यामें निपुण भनन्दनके पुत्र बलवान् वत्सप्रीने भी सुना। उसने अपने पिताके श्रेष्ठ मित्र महाराजसे विनयावनत हो प्रणाम कर कहा-'आप मुझे आज्ञा दें, मैं आपके प्रतापसे उस दैत्यको मारकर आपके दोनों पुत्रों और कन्याको छुड़ा लाऊँगा।'

अपने प्रिय मित्रके पुत्रको आनन्दपूर्वक आलिंगन कर राजाने कहा-'वत्स! जाओ, तुम्हें अपने कार्यमें सफलता प्राप्त हो।' वत्सप्री तलवार, धनुष, गोधा, अंगुलित्र आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो उस गर्तके द्वारा शीघ्र ही पातालमें चला गया। उस राजपुत्रने अपने धनुषकी डोरीका भयंकर शब्द किया, जिससे निखिल पाताल-विवर गूँज उठा। प्रत्यज्ञाके शब्दको सुनकर अतिशय क्रोधाविष्ट दानवपति कुजुम्भ अपनी सेनाके साथ आया। फिर तो दोनों सेनाओंमें युद्ध छिड़ गया। वह दानव तीन दिनोंतक उसके साथ युद्ध करनेके बाद कोपसे आविष्ट हो मूसल लानेके लिये दौड़ा। प्रजापति विश्वकर्माके द्वारा निर्मित तथा गन्ध, माल्य एवं धूपसे पूजित वह मूसल अन्तःपुरमें रखा रहता था। उधर मूसलके प्रभावसे अवगत मुदावतीने श्रद्धावनत होकर उस मूसलका पुनः-पुनः स्पर्श किया।

इसके बाद असुरपतिने रणभूमिमें उपस्थित होकर उस मूसलसे युद्ध आरम्भ किया, किंतु शत्रुओंके बीच उसका पात व्यर्थ होने लगा। परमास्त्र सौनन्द मूसलके निर्वीर्य होनेपर वह दैत्य अस्त्र-शस्त्रके द्वारा ही संग्राममें शत्रुके साथ युद्ध करने लगा। राजकुमारने उसे रथहीन कर दिया और कालाग्निके समान आग्नेयास्त्रसे उसे कालके गालमें भेज दिया। तत्क्षण पातालमें स्थित सर्पोंने महान् आनन्द मनाया। राजपुत्रपर पुष्पवृष्टि होने लगी। गन्धर्वोंने संगीत आरम्भ किया और देववाद्य बजने लगे। उस राजपुत्रने दैत्यका विनाश कर सुनीति और सुमति नामक दोनों राजपुत्रों एवं कृशांगी मुदावतीको मुक्त किया।

कुजृम्भके मारे जानेपर शेष नामक नागराज भगवान् अनन्तने उस मूसलको ले लिया। उन्होंने अतिशय आनन्दके साथ सौनन्द मूसलका गुण जाननेवाली मुदावतीका नाम सौनन्दा रखा। राजपुत्र वत्सप्री भी दोनों राजकुमारों और राजकन्याको शीघ्र ही राजाके पास ले आया और उसने प्रणाम कर निवेदन किया-'तात! आपकी आज्ञाके अनुसार आपके दोनों कुमारों और मुदावतीको मैं छुड़ा लाया हूँ, अब मेरा क्या कर्तव्य है आज्ञा प्रदान करें।' राजाने कहा-'आज मैं तीन कारणोंसे देवोंके द्वारा भी प्रशंसित हुआ हूँ-प्रथम तुमको जामाताके रूपमें प्राप्त किया, द्वितीय शत्रु विनष्ट हुआ, तृतीय मेरे दोनों पुत्र और कन्या वहींसे अक्षत-शरीर पुनः लौट आये। राजपुत्र! आज शुभ दिनमें मेरी आज्ञाके अनुसार तुम मेरी पुत्री सुन्दरी मुदावतीका प्रीतिपूर्वक पाणिग्रहण करो और मुझे सत्यवादी बनाओ।'

वत्सप्रीने कहा-'तातकी आज्ञाका पालन मुझे अवश्य करना चाहिये, अतः आप जो कहेंगे मैं उसका पालन करूँगा, आप जानते ही हैं कि पूज्यजनोंकी आज्ञाके पालनसे मैं कभी भी पराङ्मुख नहीं होता।'

इसके बाद राजेन्द्र विदूरथने कन्या मुदावती और भनन्दनपुत्र वत्सप्रीका विवाह सम्पन्न किया। विवाह हो जानेपर दम्पति रमणीय स्थानों और महलके शिखरोंपर विहार करने लगे। कालक्रमसे वत्सप्रीके पिता भनन्दन वृद्ध होकर वनमें चले गये और वत्सप्री राजा होकर यज्ञोंका अनुष्ठान एवं धर्मानुसार प्रजाका पालन करने लगे। प्रजा भी उन महात्मासे पुत्रके समान प्रतिपालित होकर उत्तरोत्तर समृद्धिशाली होने लगी।

(मार्कण्डेयपुराण)


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