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पौराणिक कथाएँ

स्वामी रामसुखदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :190
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9593
आईएसबीएन :9781613015810

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नई पीढ़ी को अपने संस्कार और संस्कृति से परिचित कराना ही इसका उद्देश्य है। उच्चतर जीवन-मूल्यों को समर्पित हैं ये पौराणिक कहानियाँ।

ऋषिने कहा-'भूख और प्यास से व्याकुल हुआ यह पक्षी मेरी शरणमें आया है। तुम लोगों के मांस से इसकी क्षणभर के लिये तृप्ति हो जाती तो अच्छा होता। तुमलोगों के रक्त से इसकी प्यास बुझ जाय, इसके लिये तुमलोग अविलम्ब तैयार हो जाओ।' 

यह सुनकर हमलोग बड़े दुखी हुए और हमारा शरीर काँप उठा, जिससे हमारे भीतर का भय बाहर निकल पड़ा और हम कह उठे-'ओह! यह काम हमसे नहीं हो सकता।'

हमलोगों की इस प्रकार की बात सुनकर सुकृष मुनि क्रोध से जल-भुन उठे और बोले-'तुमलोगों ने मुझे वचन देकर भी उसके अनुसार कार्य नहीं किया, इसलिये मेरी शापाग्नि में जलकर पक्षियोनि में जन्म लोगे।'

हमलोगों से ऐसा कहकर उन्होंने उस पक्षी से कहा-'पक्षिराज। मुझे अपना अन्त्येष्टि-संस्कार और शास्त्रीय विधि से श्राद्धादि कर लेने दो, इसके बाद तुम निश्चिन्त होकर यहीं मुझे खा लेना। मैंने अपना ही शरीर तुम्हारे लिये भक्ष्य बना दिया है।' 

आप अपने योगबलसे अपना यह शरीर छोड़ दें, क्योंकि मैं जीवित जन्तुको नहीं खाता।' पक्षीने कहा। 

पक्षीके इस वचनको सुनकर मुनि सुकृष योगयुक्त हो गये। उनके शरीर-त्याग के निश्चय को जानकर इन्द्र ने अपना वास्तविक शरीर धारण कर लिया और कहा-'विप्रवर! आप अपनी बुद्धि से ज्ञातव्य वस्तु को जान लीजिये। आप महाबुद्धिमान् और परम पवित्र हैं। आपकी परीक्षा लेने के लिये ही मैंने यह अपराध किया है। आजसे आप में ऐन्द्र अथवा परमैश्वर्ययुक्त ज्ञान प्रादुर्भूत होगा और आपके तपश्चरण तथा धर्म-कर्म में कोई भी विघ्न उपस्थित न होगा।'

ऐसा कहकर जब इन्द्र चले गये, तब हमलोगों ने अपने कुद्ध पिता महामुनि सुकृष से सिर झुकाकर निवेदन किया-'पिताजी! हम मृत्यु से भयभीत हो गये थे, हमें जीवन से मोह हो गया था, आप हम दोनों को क्षमा-दान दें। 

तब उन्होंने कहा-'मेरे बच्चो! मेरे मुँह से जो बात निकल चुकी है, वह कभी मिथ्या न होगी। आजतक मेरी वाणी से असत्य कभी भी नहीं निकला है। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि दैव ही समर्थ है और पौरुष व्यर्थ है। भाग्यसे प्रेरित होनेसे ही मुझसे ऐसा अचिन्तित अकार्य हो गया है। अब तुमलोगों ने मेरे सामने नतमस्तक होकर मुझे प्रसन्न किया है, इसलिये पक्षी की योनि में पहुँच जानेपर भी तुमलोग परमज्ञान को प्राप्त कर लोगे।' भगवन्! इस प्रकार पहले दुर्दैववश पिता सुकृष ऋषिने हमें शाप दिया था, जिससे बहुत समयके बाद हमलोगोंने (मानव-योनि छोड़कर) दूसरी योनि में जन्म लिया है।

उनकी ऐसी बात सुनकर परमैश्वर्यवान् शमीक मुनि ने समस्त समीपवर्ती द्विजगणों को सम्बोधित करके कहा-'मैंने आपलोगों के समक्ष पहले ही कहा था कि ये पक्षी साधारण पक्षी नहीं हैं, ये परमज्ञानी हैं, जो अमानुषिक युद्ध में भी मरने से बच गये।' इसके बाद प्रसन्न हृदय महात्मा शमीक मुनि की आज्ञा पाकर वे पक्षी पर्वतों में श्रेष्ठ वृक्षों और लताओं से भरे विन्ध्याचल पर्वत पर चले गये।

वे धर्मपक्षी आजतक उसी विन्ध्यपर्वत पर निवास कर रहे हैं और तपश्चरण तथा स्वाध्याय में लगे हैं एवं समाधि-सिद्धि के लिये दृढ़ निश्चय कर चुके हैं।

(मार्कण्डेयपुराण)


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