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कटी पतंग
कटी पतंग
प्रकाशक :
भारतीय साहित्य संग्रह |
प्रकाशित वर्ष : 2016 |
पृष्ठ :427
मुखपृष्ठ :
ईपुस्तक
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पुस्तक क्रमांक : 9582
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आईएसबीएन :9781613015551 |
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एक ऐसी लड़की की जिसे पहले तो उसके प्यार ने धोखा दिया और फिर नियति ने।
अंजना उनकी बातों पर ध्यान दिए बिना अपनी कार की ओर बढ़ गई और ड्राइवर से घर चलने के लिए कहा।
कार घर के फाटक पर आकर रुकी तो अंजना ने घर की चाभियों का गुच्छा हाथ में लिया और कार से उतरकर ड्राइवर को गाड़ी वापस ले जाने का आदेश दिया। तेज-तेज कदमों से उपवन की घास को रौंदती हुई वह अन्दर जाने लगी। घर में आज दूसरा कोई न था इसलिए बीना किसी झिझक के आंचल कंधों पर गिराए अन्दर चली आई।
अभी उसने सदर हाल में कदम रखा ही था कि उसके मुंह से हल्की-सी चीख निकलते-निकलते रह गई। उसने चकित होकर पहले तो राजीव को देखा जो कालीन पर बैठा अनेक खिलौनों से खेल रहा था और फिर उस पालिश किए चमकदार जूते की ओर देखा जो कालीन की ब्रश में धंसा हुआ था और उसे पहनने वाला बाबूजी की आराम कुर्सी में धंसा हुआ बच्चे को खेलते देख रहा था।
अंजना का कलेजा मुंह को आ गया। दिल की धड़कन जैसे रुक-सी गई। वह धीरे-धीरे कदम उठाती उस आदमी की ओर बढ़ी जिसका जूता अभी तक उसकी आंखों के सामने चमक रहा था। उसने जैसे ही अपनी गरदन उठाई, अंजना के कलेजे में एक हूक उठी और वहीं रुक गई। उसके मोटे और भद्दे जबड़ों को खुला देखकर अंजना को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ।
उसके सामने इस दिलेरी से आ बैठने वाला और कोई नहीं था बल्कि उसके जीवन को आग लगाने वाला बनवारी था। वह अंजना को भयभीत और चकित दशा में देखकर कुर्सी पर और पसर गया। बोला-''कैसी हो अंजू?''
''तुम-! यहां-! क्या करने आए हो?''
''अपनी बिछुड़ी हुई ज़िंदगी की तलाश में भटकता हुआ आ पहुंचा।''
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