लोगों की राय
ई-पुस्तकें >>
कटी पतंग
कटी पतंग
प्रकाशक :
भारतीय साहित्य संग्रह |
प्रकाशित वर्ष : 2016 |
पृष्ठ :427
मुखपृष्ठ :
ईपुस्तक
|
पुस्तक क्रमांक : 9582
|
आईएसबीएन :9781613015551 |
 |
|
7 पाठकों को प्रिय
38 पाठक हैं
|
एक ऐसी लड़की की जिसे पहले तो उसके प्यार ने धोखा दिया और फिर नियति ने।
उसकी विवशता और उसका पाप उभरकर उसकी आशाओं के सितारों को अपनी स्याहियों में छिपा लेते थे। मगर आज कमल ने अपने दिल की बात कहकर उसके तन बदन में छिपी ज्वाला को और भड़का दिया था। उसकी आशाओं और सपनों की पूर्ति के लिए एक रास्ता निर्धारित कर दिया था, उन्हें साकार रूप देने के लिए एक झलक दिखा दी थी और उसे लग रहा था जैसे बरसात के ये छींटे उसकी आशाओं को सींच रहे हैं।
राम जाने क्या सोचकर उसने अल्मारी में से पैड और कलम निकाला और अपने मन की वेदना को पैड के एक कागज पर कत करती चली गई। शायद वह अपने दिल की आवाज उस लेख में छिपाकर कमल तक पहुंचाना चाहती थी।
अकस्मात् उसका हाथ रुक गया। कलम की स्याही कागज पर फैल गई और हवा से लहराते हुए खिड़की के पर्दे में एक छाया छिपी नजर आई। पूनम के अन्तिम सांसों में गुंथी हुई आवाज उस तक पहुंचने लगी और उसके साथ ही एक वचन जो उसने मरने से पहले अपनी सहेली को दिया था, एक प्रण जिसे जीवन-भर निभाने की सौगन्ध खाई थी, उसे याद आने लगा और फिर अपने आप ही उसकी नजरें राजीव के कोमल चेहरे की ओर उठ गईं। उसने कागज पर लिखी बातों की ओर एक बार देखा, शायद कुछ पढ़ भी लिया और फिर उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जब वह उन टुकड़ों को खिड़की से बाहर फेंकने लगी तो राम जाने क्या सोचकर ठिठक गई और लौटकर उन्हें आतिशदान में दबी चिनगारियों के हवाले कर दिया।
...Prev | Next...
मैं उपरोक्त पुस्तक खरीदना चाहता हूँ। भुगतान के लिए मुझे बैंक विवरण भेजें। मेरा डाक का पूर्ण पता निम्न है -
A PHP Error was encountered
Severity: Notice
Message: Undefined index: mxx
Filename: partials/footer.php
Line Number: 7
hellothai