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फ्लर्ट

प्रतिमा खनका

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :609
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9562
आईएसबीएन :9781613014950

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जिसका सच्चा प्यार भी शक के दायरे में रहता है। फ्लर्ट जिसकी किसी खूबी के चलते लोग उससे रिश्ते तो बना लेते हैं, लेकिन निभा नहीं पाते।

84

अगली सुबह 9 बजे।


मैं सोकर उठा ही था कि मेरा सेल फोन और डोर बैल एक साथ बजी। मेरी मेट ने जाकर दरवाजा खोला और आकर मुझे बताया कि-

‘सोनाली मैडम है।’

मैं उसी हाल में बाहर आ गया। अपने लिविंग रूम का नजारा देखकर मेरा सारा आलस्य छू हो गया!

लोग फूल लाते हैं वो पूरी दुकान अपने साथ ले आयी थी। अलग अलग तरह के फूल, अलग अलग तरह के गुच्छों में बँधे। वो अपने साथ लगभग 40 गुलदस्ते लायी थी जिनमें से एक उसके हाथ में था और बाकी को डिलिवरी बॉय लाये थे। उसे जहाँ-जहाँ अच्छा लगा वहाँ-वहाँ उसने फूल सजा दिये। मैं और मेरी मेट लिविंग रूम का एक कोना पकड़कर चुपचाप खड़े उन्हें देख रहे थे।

फ्लावर शाप बन्द हुई।

‘अब हम बैठ सकते हैं?’ मैंने धीमे से सोनू से पूछा। उसने मुस्कुरा कर हाँ में सिर हिलाया।

कितने वक्त बाद मैं इस चेहरे को देख रहा था। धानी रंग का राउन्ड नेक बॉडीकॉन पहने हुए वो आज भी किसी परी जैसी ही लग रही थी..... हमेशा की तरह। कुछ देर हम दोनों ही खामोश रहे जैसे कहने को कुछ मिल ही न रहा हो। हालात कभी बिल्कुल ऐसे ही थे। हम दोनों इसी तरह मिलते थे, इतने ही अपनेपन से लेकिन फिर वो हालात क्या से क्या हो गये और हम उस बदलाव में बहते-बहते फिर वहीं आ पहुँचे.... उसी जगह। आज फिर वो ही अपनापन। वही खुशी। वही खिंचाव।

‘तुम क्या लोगी? चाय... कॉफी? जूस?’

‘मैं....’

उसके जवाब से पहले डोर बैल बज उठी। मैंने मेट को इशारा किया।

ये कोई बेनाम तोहफा था किसी अन्जाने फैन की तरफ से। मैंने वो हाथ में लिया और उसके बाद मैं सारा दिन ठीक से बैठ नहीं पाया। हर पाँच सात मिनट बाद ऐसा ही कोई तोहफा मिल रहा था। कुछ गिफ्ट ऐसे थे जिनमें नाम था लेकिन ज्यादातर बेनाम थे। मैं हैरान था लेकिन सोनू के लिए ये भी कोई मजाक ही था।

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