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एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560
आईएसबीएन :9781613015568

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


11


घाटी के अलग कोने में अकेली कोठी थी यह। बाहर से देखने में तो छोटी; परन्तु भीतर कमरे बड़े-बड़े थे। कोठी के चारों ओर खुला मैदान था जिसकी उजड़ी हुई दशा से ज्ञात होता था मानो कभी वहाँ बहुत बड़ा बाग रहा होगा।

पहले तो दोनों आसपास उजड़े हुए स्थान को देखकर चुप रहे; परन्तु फिर साहस करके बारी-बारी खाली कमरों का निरीक्षण करने लगे।

कमरे मिट्टी से अटे पड़े थे और इधर-उधर कितने ही मकड़ी के जाले लगे हुए थे। कमरों की जीर्ण दशा और बन्द हवा से प्रतीत होता था जैसे एक समय से इसमें किसी का वास नहीं हुआ।

बंसी ने उन्हें बताया कि वर्षों पूर्व यहाँ एक अंग्रेज़ रहता था। उसकी पत्नी को किसी हिन्दुस्तानी से प्रेम हो गया। एक दिन दोनों में झगड़ा हुआ और अंग्रेज़ ने अपनी पत्नी को गोली का निशाना बनाकर स्वयं भी आत्महत्या कर ली। तब से यह घर उजड़ा पड़ा है। एक-दो बार चन्द साहसी युवकों ने इसे बसाने का प्रयत्न भी किया, परन्तु उन्हें भी यह स्थान छोड़ना पड़ा। कहते हैं हर अमावस और पूर्णिमा को दोनों आत्माएँ भूत बनकर यहाँ आती हैं।

बंसी चुप हो गया। विनोद और माधवी ने देखा कि कहानी सुनाते हुए उसका मुख पीला पड़ गया था, माथे पर पसीना फूट आया था और साँस तेज़ी से चलने लगी थी, मानो अभी-अभी चढ़ाई चढ़कर आया हो।

विनोद ने मुस्कराकर माधवी की ओर देखा-उसके होंठों पर मुस्कान थी। इतनी भयपूर्ण कहानी सुनकर भी तो उसे तनिक घबराहट न हुई! वह नये युग की शिक्षित नारी थी। ऐसी व्यर्थ की बातों पर उसे विश्वास न था।

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