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ई-पुस्तकें >> एक नदी दो पाट

एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560
आईएसबीएन :9781613015568

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


2


कामिनी को जब पता लगा कि उसका पति उसके साथ जाने को तैयार है तो वह मन-ही-मन प्रसन्न हुई, परंतु अपनी इस प्रसन्नता को उसने किसी पर स्पष्ट न होने दिया।

विनोद कामिनी के संग अपनी ससुराल तो गया परन्तु रास्ते-भर उसने उससे कोई बात न की। ससुराल में भी बस चुपचाप और खिंचा-खिंचा रहा।

कामिनी की सब सहेलियाँ उससे मिलने के लिए आईं। उनमें कान्ती भी थी जो विनोद को देखकर अब घबराई नहीं; बल्कि सीधी उसके सामने से होती हुई कामिनी के पास चली गई। विनोद ने छिपी दृष्टि से उसे देखा। शायद वह मन-ही-मन मुस्करा रही थी। विनोद को अपनी ओर देखते देखकर वह कामिनी से बोली, 'कैसा मिज़ाज है अब हमारे जीजा का?' कान्ती ने यह प्रश्न कुछ यूँ किया मानो किसी ने मधुर विष विनोद के कानों में उँड़ेल दिया हो।

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