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भगवान महावीर की वाणी

स्वामी ब्रह्मस्थानन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9554
आईएसबीएन :9781613012659

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भगवान महावीर के वचन

धर्म


¤ धर्म उत्कृष्ट मंगल है। अहिंसा, संयम और तप उसके लक्षण हैं। जिसका मन सदा धर्म में रमा रहता है, उसे देव भी नमस्कार करते हैं।

¤ वस्तु का स्वभाव धर्म है। क्षमा आदि भावों की अपेक्षा से वह दस प्रकार का है। रत्नत्रय (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र) तथा जीवों की रक्षा करना धर्म है।

¤ उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य तथा उत्तम ब्रह्मचर्य - ये दस धर्म हैं।

¤ देव, मनुष्य और तीर्थञ्चों (पशुओं) के द्वारा घोर व भयानक उपसर्ग पहुचाने पर भी जो क्रोध से तप्त नहीं होता, उसके निर्मल क्षमाधर्म होता है।

¤ मैं सब जीवों को क्षमा करता हूँ। सब जीव मुझे क्षमा करें। मेरा सब प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव है। मेरा किसी से भी वैर नहीं है।

¤ अल्पतम प्रमादवश भी मैंने आपके प्रति उचित व्यवहार नहीं किया हो तो मैं निःशल्य और कषायरहित होकर आपसे क्षमायाचना करता हूँ।

¤ जो श्रमण कुल, रूप, जाति, ज्ञान, तप, श्रुत और शील का तनिक भी गर्व नहीं करता, उसके मार्दवधर्म होते हैं।

¤ जो दूसरे को अपमानित करने के दोष का सदा सावधानीपूर्वक परिहार करता है, वही यथार्थ में मानी है। गुणशून्य अभिमान करने से कोई मानी नहीं होता।

¤ जो कुटिल विचार नहीं करता, कुटिल कार्य नहीं करता, कुटिल वचन नहीं बोलता और अपने दोषों को नहीं छिपाता, उसके आर्जव-धर्म होता है।

¤ जो भिक्षु (श्रमण) दूसरे को संताप पहुँचाने वाले वचनों का त्याग करके स्व-पर-हितकारी वचन बोलता है, उसके चौथा सत्यधर्म होता है।

¤ असत्य भाषण के पश्चात् मनुष्य यह सोचकर दुखी होता है, कि वह झूठ बोलकर भी सफल नहीं हो सका। वह असत्य भाषण से पूर्व इसलिए व्याकुल रहता है, कि वह दूसरे को ठगने का संकल्प करता है। वह इसलिए भी दुःखी रहता है, कि कहीं कोई उसके असत्य को जान न ले। इस प्रकार असत्य व्यवहार का अन्त दुःखदायी ही होता है। इसी तरह विषयों में अतृप्त होकर वह चोरी करता हुआ दुःखी और आश्रयहीन हो जाता है।

¤ अपने गणवासी (साथी) द्वारा कही हुई हितकर बात, भले ही वह मन को प्रिय न लगे, कटुक औषध की भांति परिणाम में मधुर ही होती है।

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