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भगवान बुद्ध की वाणी

स्वामी ब्रह्मस्थानन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :72
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9553
आईएसबीएन :9781613012871

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भगवान बुद्ध के वचन

भगवान बुद्ध

भगवान् बुद्ध का जन्म राजा शुद्धोदन और मायादेवी के पुत्र के रूप में कपिलवस्तु के समीप लुम्बिनी में हुआ था। उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया, जिसका अर्थ है 'वह, जिसने अपना उद्देश्य पूर्ण कर लिया है।' उनके पिता ने शिशु राजकुमार को देखने के लिए एक विद्वान् ब्राह्मण ऋषि को आमन्त्रित किया और उसे देखते ही ऋषि ने भविष्यवाणी की ''अलौकिक लक्षणों से यह ज्ञात होता है कि नवजात शिशु सारे संसार को मुक्ति प्रदान करेगा।'' किन्तु ऋषि ने राजा को यह चेतावनी भी दी कि अगर बालक किसी समय रोगी, वृद्ध या मृतक को देखेगा, तो वह संसार का त्याग भी कर सकता है। राजा यह सुनकर अत्यन्त चिन्तित हो उठे। उन्होंने अल्पावस्था में ही सिद्धार्थ का विवाह कर दिया और उन्हें एक प्रकार से सुखोपभोग के समस्त साधनों से परिपूर्ण विलास-उद्यान में बन्दी ही बना लिया। पर अवश्यम्भावी को कौन रोक सकता है ? जिस प्रकार जंजीरों में बँधा हाथी जंगलों में घूमने के लिए व्यग्र हो उठता है, उसी प्रकार राजकुमार भी संसार को देखने के लिए आतुर हो उठे। सारे पथ सजाये गये और सारा नगर उत्साह से भर उठा। नगर का परिभ्रमण करते हुए सिद्धार्थ ने एक बूढे को, एक रोगी को, एक मृतक को और अन्त में एक संन्यासी को देखा। सिद्धार्थ को बताया गया कि प्रथम तीन दृश्य बिरले नहीं हैं, क्योंकि ये तो समस्त जीवित प्राणियों की अवश्यम्भावी नियति है। इससे सिद्धार्थ अत्यन्त विचलित हुए और गहन चिन्तन में डूब गये।

जब वे राजभवन वापस लौटे, तब किसी ने उन्हें यह शुभ समाचार प्रदान किया कि उनकी पत्नी यशोधरा ने एक पुत्र को जन्म दिया है और उसका नाम राहुल रखा गया है। इस समाचार से प्रसन्न होने के बदले सिद्धार्थ ने विचार किया, 'यह तो बन्धन के ऊपर लदा बन्धन है' और उन्होंने सत्य की खोज के लिए संसार का त्याग करने का निश्चय किया। उनका यह निश्चय तब कार्य रूप में परिणत हुआ, जब उन्होंने अपने अवतरण के प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए सर्वस्व का परित्याग करते हुए प्रव्रज्या ग्रहण कर ली। वे उरुविल्व (बुद्धगया) पहुँचे और वहाँ एक वट-वृक्ष के नीचे आत्मज्ञान प्राप्त करने का संकल्प लेकर आसीन हो गये। छह वर्षों की कठिन साधना के उपरान्त उन्हें चिरवांछित आत्मज्ञान प्राप्त हुआ और वे बोधिसत्व हो गये। तदुपरान्त उन्होंने अपने नये सन्देश का प्रचार करना आरम्भ किया।

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