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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


मैंने देवलोक जाने का निश्चय कर लिया और विमान पर सवार होकर चौथाई प्रहर में मैं सुरराज के समक्ष जा उपस्थित हुआ। मैंने उनको नमस्कार कर पूछा, ‘‘कहिए देवाधिदेव? क्या आज्ञा है?’’

इन्द्र मुझको देखकर मुस्कराया और कहने लगा, ‘‘कितने वर्ष हो चुके हैं आपको यहाँ से गये?’’

मैंने विचारकर बताया, ‘‘लगभग दस वर्ष।’’

इन दस वर्षों में क्या उपकारी कार्य सम्पन्न किया है आपने?’’

मैंने विचार किया और कहा, ‘‘श्रीमान्! जब सुरराज मेरे कार्य को विध्वंस करने में कटिबद्ध हैं, तो मैं क्या कर सकता था? इस पर भी मुझको सन्तोष है कि मैंने कोई उपाय नहीं छोड़ा, वहाँ की स्थिति सुधारने का। मैंने ब्राह्मण-धर्म का पालन किया है।’’

‘‘परन्तु वे तो आपको ब्राह्मण मानते नहीं। वे आपको एक शूद्र का पुत्र, पढ़ा लिखा शूद्र मानते हैं। यदि आपको ब्राह्मण समझते तो आपसे अम्बिका तथा अम्बालिका को नियोग की स्वीकृति दे देते और अपने परिवार में एक भले पुरुष से बीजारोपण कराकर उसका सुधार कर लेते।’’

‘‘महाराज?’’ मैंने कहा, ‘‘यदि मुझसे उनको नियोग की स्वीकृति देते तो भी मैं इसके लिए तैयार न होता। आपको कदाचित् यह विदित नहीं कि राजमाता सत्यवती, राजकुमार भीष्म और दोनों महारानियों ने मिलकर मुझसे नियोग के लिए याचना की थी, परन्तु मैंने ही स्वीकार नहीं किया था।’’

‘‘हमको सब विदित है। परन्तु सत्यवती को यह पहले ही विदित था कि आप नियोग के विरुद्ध हैं और जो वह समझती थी, वही आपने किया। यदि उनको कुछ भी संदेह होता कि आप मान जायेंगे, तो वे कभी भी उस प्रकार परिवार में आपको बुलाकर नियोग बुलाकर नियोग का प्रस्ताव न रखती।’’

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