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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
चतुर्थ परिच्छेद
1
समय व्यतीत होने लगा। मेरी पत्नी नीललोचना कुछ रुग्ण रहने लगी। मैं हस्तिनापुर राज्य से अवकाश प्राप्त कर, अपनी पत्नी की चिकित्सा के लिए, उसे लेकर पिताजी के आश्रम पर जा पहुँचा। मेरे तीनों बच्चे पिताजी के पास ही रहते थे और उनसे शिक्षा प्राप्त कर रहे थे।
नीललोचना की सेवा-शुश्रूषा के लिए आश्रम में मुझे कई वर्ष तक रहना पड़ा, परन्तु उसे लाभ नहीं हुआ। तत्पश्चात् एक दिन वह मेरी गोद में सिर रखे-रखे परलोक सिधार गई।
अब मैंने पुनः हस्तिनापुर जाने का विचार बना लिया। अपने बच्चों को मैं पिताजी के पास ही छोड़ जाने का विचार रखता था। पिताजी मुझे हस्तिनापुर भेजने के विरुद्ध थे। उनका कहना था कि वहाँ की जलवायु ठीक नहीं है। परन्तु मैं अपने चंचल मन को लगाने के लिए कार्यक्षेत्र चाहता था। अतः मैंने अपना हस्तिनापुर जाने का निर्णय कर लिया।
इस समय देवलोक से मुझे ले जाने के लिए सुरराज ने विमान भेज दिया। पिताजी इससे प्रसन्न नहीं थे। वे इन्द्र के मित्र होने पर भी उसकी कूटनीति को पसन्द नहीं करते थे।
विमान-चालक यह सन्देश लाया कि सुरराज की इच्छा है कि मैं उनको दर्शन दूँ। इससे यह पता नहीं चल सका कि किस प्रकार का कार्य है।
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