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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘परन्तु आप इन स्त्रियों पर नियंत्रण क्यों नहीं रखते?’’
‘‘यह मेरे मान की नहीं। इनकी पुत्रवधुएँ जब आयेंगी, तो वे ही इनको सीधे मार्ग पर ला सकेंगी।’’
‘‘यह स्त्रियों द्वारा संचालित राज्य कब तक चस सकेगा?’’
‘‘राज्य तो मैं चला रहा हूँ।’’
‘‘महाराज! एक बार इससे पूर्व मैंने निवेदन किया था कि राज्य चलाने में प्रथम कार्य यह है कि राज्य का उत्तराधिकारी एक श्रेष्ठ सर्वगुण-सम्पन्न व्यक्ति बनाया जाय। यह प्राणियों में एक स्वाभाविक कृत्य है कि यौवन प्राप्त कर एक उत्तराधिकारी निर्माण करें। यही बात राज्य की है।’’
‘‘यह सब हो जायेगा। जब इन कुमारों के पुत्र उत्पन्न होंगे, तब आप उनको उचित शिक्षा देने का प्रबन्ध कर दीजियेगा।’’
इसके पश्चात् मेरे कहने को कुछ नहीं रहा। मैं घर पर आकर कुन्तिभोज की नगरी के लिए प्रस्थान करने की तैयारी में लीन हो गया।
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