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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘संजयजी! गान्धारों की कन्या से विवाह एक राजनीति की बात है। मैं अपने देश की पश्चिमोत्तरी सीमा पर अपने मित्र बना लेना चाहता हूँ। यह कार्य धृतराष्ट्र के विवाह से सम्पन्न हो जायेगा। साथ ही मैंने गान्धारराज को वचन दिया है कि कुछ विश्वकर्मा लोग यहाँ से गान्धार राज्य में भेजकर उस देश की अवस्था सुधारने का यत्न करूँगा।’’
इस पर मैंने कहा, ‘‘महाराज! विश्वकर्मा भेजने से पूर्व वहाँ कुछ वैश्य-समाज के लोग तथा कुछ ब्राह्मण भेजने चाहिएँ, जिससे वे कोई योजना बना सकें तथा वहाँ व्यापार आदि की उन्नति हो सके। जब तक उनके राज्य की आय तथा उपज नहीं बढ़ जाती, विश्वकर्मा के भेजने से क्या लाभ होगा?’’
‘‘वह भी हो जायेगा।’’
‘‘परन्तु महाराज! यह पांडु को स्वयंवर के लिए भेजने से तो उसके विवाह का प्रबन्ध हो जायेगा।’’
‘‘मैं समझता हूँ कि पांडु को स्वयंवर में चुने जाने की कोई सम्भावना नहीं है। वहाँ अन्य राजे-महाराजे भाग लेने के लिए जायेंगे। उनके सामने पाँडु अभी बालक-मात्र है। उसकी माँ महारानी अम्बालिका हठ कर रही हैं। वे भी उत्सुक है कि पांडु के पुत्र पहले उत्पन्न हो जाये, जिससे राज्य उसकी सन्तान के हाथ में आ जायें।’’
‘‘महाराज! यह प्रवृत्ति तो बहुत दोषपूर्ण है। राज्य-प्राप्ति के लिए राज्य-परिवार का नाश किया जा रहा है।’’
‘‘परन्तु इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता। यह स्त्रियों की बात मुझे माननी ही पड़ती है। यदि उनकी किसी बात को इन्कार करता हूँ तो वे रोने लगती हैं। विवश मुझको चुप रहना पड़ता है।’’
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