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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


इस प्रकार राजकुमार धृतराष्ट्र के विवाह की तिथि निश्चित होने से पूर्व ही मुझको हस्तिनापुर से बाहर भेज दिया गया। मैं महाराज कुन्तिभोज से मिला और जब मैंने भीष्मजी का प्रस्ताव उनके सम्मुख रखा तो उन्होंने कहा, ‘‘मुझको इस सम्बन्ध से बहुत प्रसन्नता होगी, परन्तु पृथा अब सज्ञान है और उसके लिए कई स्थानों से विवाह के प्रस्ताव आये हैं, अतएव उसकी इच्छा स्वयंवर करने की है। इस कारण मैं राजकुमार पांडु को भी उस स्वयंवर पर पधारने का निमन्त्रण देता हूँ।’’

स्वयंवर-निमन्त्रण लेकर मैं हस्तिनापुर वापस पहुँचा तो मुझको विदित हुआ कि धृतराष्ट्र के विवाह की तिथि निश्चित हो चुकी है और विवाह के लिए राजमाता तथा अन्य राज्य-परिवार के लोग दलबल सहित गान्धार जाने की तैयारी में लगे हैं। मुझको ऐसा समझ में आया कि राजमाता ने मेरे विचार जान मेरे पीछे यह निश्चय करा लिया है। परन्तु जब मुझे पता चला कि महारानी अम्बिका ने यह जल्दी मचाई है तो मुझे हँसी आ गई।

मेरे हस्तिनापुर पहुँचने की सूचना मिलने पर छोटी महारानी अम्बालिका ने मुझे बुला भेजा। मैंने उनको स्वयंवर की बात बताई तो उन्होंने कहा, ‘‘इस अवस्था में पांडु धृतराष्ट्र के विवाह पर नहीं जा सकेगा। स्वयंवर की तिथि निश्चित है, परन्तु विवाह तो स्थगित किया जा सकता है।’’

परन्तु राजकुमार तथा राजमाता नहीं मानीं। उन्होंने मुझको आज्ञा दे दी कि स्वयंवर पर मैं राजकुमार पाँडु के साथ जाऊँ। अन्य सब लोग विवाह पर जायेंगे।

मैंने भीष्म को समझाने का यत्न किया। मैंने कहा, ‘‘महाराज! आखिर कुमारों के विवाह की इतनी शीघ्रता क्यों की जा रही है? ये अभी विवाह की आयु के हुए नहीं। न ही संसार की सब सुन्दर कन्याएँ समाप्त होने जा रही हैं।’’

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