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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘क्यों? क्या पुनः कुछ गड़बड़ हुई है?’’
‘‘दासियाँ बता रही थीं।’’
‘‘तो आप दासियों को मना कर दें। विवाह इस अवस्था में ठीक नहीं है।’’
‘‘अपनी दादी के पुत्र की भाँति इसको भी मरने क्यों न दूँ?’’
‘‘मैं उनको शिक्षा-दीक्षा के लिए नियुक्त हूँ, महारानीजी! मैं यह सहन नहीं कर सकता।’’
महारानी अम्बिका हँस पड़ी और कहने लगीं, ‘‘तो उसको सुधारने का यत्न कीजिए। परन्तु मैं कहती हूँ कि इसका कुछ फल नहीं होगा। जिस मिट्टी का वह बना है, वह मिट्टी ही गलत है।’’
इस समय कुमार आ गये और महारानीजी चली गयीं।
इसके कुछ दिन पश्चात् मैं एक रात्रि भोजनोपरान्त विश्राम के लिए शयनागार में जाने ही वाला था कि भीष्मजी ने बुला भेजा। मैं उनके आगार में गया तो उन्होंने मुझको समीप बैठाकर कहा, ‘‘संजयजी! हमको सूचना मिली है कि महाराज कुन्तिभोज की लड़की विवाह योग्य है। आप उनके पास जाकर उनकी लड़की पांडु के लिए माँगिये।’’
‘‘महाराज!’’ मैंने कहा, ‘‘जहाँ तक मुझको ज्ञात है कि महाराज कुन्तिभोज की लड़की पृथा की आयु अठारह वर्ष की है और कुमार पांडु अभी सत्रह के लगभग है। यह विचार बेमेल का होगा।’’
‘‘यह कोई कारण नहीं। संजयजी! आप जाइये और उनसे बात-चीत कीजिये। विवाह की तिथि पीछे निश्चित होगी।’’
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