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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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मैं अभी गान्धार में ही था कि राज-परिवार ने यह विवाह-स्वीकार कर लिया। मुझको पता चला कि इस विवाह के पक्ष में सुबल का पुत्र शकुनि सबसे अधिक था। विवाह की स्वीकृति के लिए पत्र तथा कर का धन लेकर मैं हस्तिनापुर पहुँचा तो शकुनि भी वहाँ आ पहुँचा। उसको राज्य का अतिथि मान राजप्रासाद में रखा गया।
शकुनि गान्धारी से दो वर्ष छोटा था। गान्धारी की आयु पन्द्रह वर्ष की थी। धृतराष्ट सत्रह वर्ष का हो चुका था। शकुनि अपने राज्य के कुछ कर्मचारियों के साथ आया था और विवाह की तिथि निश्चिय करने का प्रयत्न कर रहा था। इस समय एक चमत्कार हुआ। राजमाता तो विवाह की उतावली मचा ही रही थीं, अब महारानी अम्बिका भी शीघ्र विवाह कर देने के पक्ष में हो गईं।
एक दिन मैं कुमारों के आगार में बैठा, पढ़ाने के लिए कुमारों की प्रतीक्षा कर रहा था, महारानी अम्बिका आ पहुँची और मुझको सम्बोधन कर पूछने लगीं, ‘‘संजयजी! शकुनि से भेंट हुई है?’’
‘‘नहीं महारानीजी! मैंने उसको गान्धार में ही देखा था। वह अभी बालक-मात्र ही तो है।’’
‘‘ठीक है, परन्तु उसके लक्षण अच्छे प्रतीत नहीं हो रहे। वह जूआ तो खेलता ही है, साथ ही मुझे दासियों ने बताया है कि वह चोर भी है।’’
‘‘उससे सावधान रहना चाहिए महारानीजी! मैं इस विवाह-सम्बन्ध में प्रसन्न नहीं हूँ। परन्त राजमाता कुमार के विवाह के लिए बहुत उतावली प्रतीत होती है।’’
‘‘मेरे विचार में भी विवाह हो ही जाना चाहिए अन्यथा यह मूर्ख यहाँ की सब दासियों को खराब करता फिरेगा।’’
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