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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘परन्तु हमारे पास तो अपने खाने-पहनने के लिए भी धन नहीं बचता, हम कर कहाँ से दे सकते हैं?’’
‘‘इसके कारण तो यह और भी आवश्यक हो रहा है कि आप यह धन कुरु-राज्य को देते जाएँ। आपको निर्धन, निर्बल और निस्सहाय जान तो कोई भी आप पर आक्रमण कर देगा।’’
‘‘परन्तु संजयजी! कुछ ऐसा भी उपाय बताइये, जिससे हमारे राज्य में धन-धान्य की उपलब्धि हो, और हम कर दे सकें।’’
‘‘देखिये महाराज! राज्य में उन्नति करने के लिए आप किसी विद्वान् ब्राह्मण को मन्त्री बनाकर उससे परामर्श लीजिये और फिर उसके कहने के अनुसार राज्य चलाइए। इससे सुख, सम्पदा और साधनों में प्रचुरता आपको प्राप्त होगी।’’
मेरी बात सुन महाराज सुबल चुप हो गए। तत्पश्चात् कुछ देर तक विचारकर उन्होंने कहा, ‘‘आप किसी योग्य ब्राह्मण की खोज कर दीजिए जिसको हम अपना मन्त्री बना सकें।’’
‘‘यह कर दिया जायेगा। मेरी सम्मति है कि आप एक वर्ष का कर भेज दें और भविष्य में अपने सम्बन्ध कुरु-राज्य से मानयुक्त और समानता के बनाये रखने के लिए कुरु-राज्य का एक प्रस्ताव स्वीकार कर लें। प्रस्ताव आपकी लड़की राजकुमारी गान्धारी के विषय में हैं।’’
‘‘महारानी इस सम्बन्ध को पसन्द नहीं करती।’’
‘‘कारण जान सकता हूँ, महाराज?’’
‘‘सुना है राजकुमार जन्म के अन्धे है।’’
‘‘इससे क्या होता है महाराज! अभी तक महाराजकुमार भीष्म जीवित हैं और राज्य-कार्य चला रहे हैं। हमें पूर्ण आशा है कि उनके जीवन-काल में ही आपका दौहित्र सज्ञान होकर राज्य सँभालने के योग्य हो जायेगा। यह निश्चय हो चुका है कि दोनों भाईयों में, धृतराष्ट्र तथा पांडु में जिसकी सन्तान बड़ी होगी, उसका पुत्र ही राज्याधिकारी होगा। राजमाता इसी कारण पहले धृतराष्ट्र का आपकी लड़की से विवाह करना चाहती हैं। वे चाहती हैं कि राजकुमार धृतराष्ट्र का पुत्र ही राजगद्दी पर बैठाया जाये।’’
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