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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
यह धन मिला और मैं गान्धार देश में जा पहुँचा। गान्धार-राज्य की राजधानी देखकर और उसकी तुलना हस्तिनापुर से करके मेरी उसके विषय में बहुत ही घटिया सम्मति बनी। कच्चे मार्ग, मिट्टी के कच्चे मकान, स्थान-स्थान पर गन्दगी और वहाँ के निवासी भी गन्दे थे। ये सब निर्धनता के लक्षण थे। राज्य की अवस्था भी कुछ विशेष अच्छी नहीं थी। मुझे यह देख अत्यन्त दुःख हुआ।
जब मुझे गान्धारराज के सम्मुख ले जाया गया तो उसका पुत्र शकुनि उनके पास ही बैठा था। जब मैंने अपना परिचय, महर्षि गवल्गण का पुत्र, धृतराष्ट्र आदि कुमारों के गुरु के रूप में दिया तो उन्होंने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया। आगे जब मैंने कहा कि मैं कुरुराज्य का दूत हूँ और सुरराज की सम्मति से उपस्थित हुआ हूँ तो वे सचेत हो गये और आदर-युक्त भाव बनाकर मेरा मुख देखने लगे। मैं उनके मुख पर परिवर्तित होते भाव देख विस्मित हो गया। मेरे मन पर यह अंकित हो गया कि इस राज्य में भी ब्राह्मणों का आदर नहीं है। यहाँ भी राजसत्ता और बल का मान होता है।
अपने परिचय के उपरान्त मैंने अपने वहाँ आने का आशय वर्णन कर दिया। मैंने कहा, ‘‘श्रीमान्! आपने पिछले वर्ष कर नहीं भेजा। इस वर्ष का भी कर शेष है। इस कारण राजकुमार भीष्मजी ने मुझको आपकी सेवा में उपस्थित होकर यह निवेदन करने के लिए कहा है कि आपको कर तो देना चाहिए।’’
‘‘क्यों देना चाहिए? हमारा राज्य कुरु-राज्य के अधीन नहीं है।’’
‘‘ठीक है महाराज! परन्तु यह कर इस बात का सूचक नहीं कि आप किसी के अधीन है। भारत में सब कुरु-राज को सम्राट मानते हैं और कर देते हैं। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे कुरु-राज्य के दास हैं। कर इस कारण है कि हस्तिनापुर सब राज्यों की रक्षा का भार अपने सिर पर ले रहा है। कामभोज के विरुद्ध आपकी सहायता की जा रही है। इसी प्रकार कश्मीर राज्य से आपकी रक्षा होती रही है। इसके लिए कुरु-राज्य को विशेष सेना और युद्ध-सामग्री तैयार रखनी पड़ती है। इसी कारण सब राज्य कुरु-राज्य को प्रतिवर्ष यह कर देते हैं।’’
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