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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘मैं तो अन्धे की सन्तान भी अन्धी देखकर प्रसन्न होऊँगी।’’
मुझे तो ऐसा ही प्रतीत हुआ कि महारानी अभी भी कृष्ण द्वैपायन के प्रति अपने मन में घृणा नहीं निकाल सकी थीं। इस कारण उससे प्राप्त सन्तान से उनको किंचितमात्र भी स्नेह नहीं था। इस पर भी इस विषय में मैं सदैव चुप रहता था।
अगले दिन मुझको भीष्मजी ने बुलाकर पुनः सुरराज के विषय में पूछना आरम्भ कर दिया। मेरे सब बातें बताने पर उन्होंने कहा, ‘‘तो तुम गान्धार-राज से मिलने जाओगे?’’
‘‘यदि आज्ञा होगी तो अवश्य जाऊँगा।’’
‘‘राजमाता का कहना है कि यदि आप धृतराष्ट्र के विवाह का निश्चय कर सके तो आपको भारी पुरस्करा मिलेगा।’’
‘‘मैं अपनी ओर से पूर्ण यत्न करूँगा।’’
‘‘तो आप जाने के लिए तैयार हो जाइये।’’
इस समय मुझे ध्यान आ गया कि मार्ग-व्यय के लिए अग्रिम माँग लेना चाहिए। अभी तक मेरे देवलोक जाने के काल का वेतन भी पूरा नहीं दिया गया था। इस कारण मैंने कह दिया, ‘‘श्रीमान्! मार्ग-व्यय के लिए धन मिल जाना चाहिए।’’
‘‘कितना चाहते हैं आप?’’
‘‘अभी दो सहस्त्र स्वर्ण दे दीजिये। आने पर व्यय का पूर्ण विवरण दे सकूँगा।’’
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