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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘सत्रह वर्ष के और राजकुमारजी ने उनका विवाह दो पत्नियों से कर दिया था। अतः वह शीघ्र ही रुग्ण हो गये और परलोक सिधार गये। देखो कुमार, यदि तुम दीर्घकाल तक संसार का सुख भोगना मत आने दो। निमिनया तो एक शूद्र-कन्या है। तुम्हारा विवाह तो एक अति सुन्दर राजकन्या से होगा। वह जीवन-भर तुम्हारी संगिनी बनकर रहेगी और तुमको बहुत सुख देगी।’’

धृतराष्ट्र समझ गया। मैं उसी सायंकाल महारानी अम्बिका से मिला और निमनिया की बात बताकर उसको राजप्रासाद से निकाल दिये जाने की आज्ञा दिलवा दी। महारानी अम्बिका ने कहा, ‘‘संजय जी! आप गान्धार जाएँगे तो क्या निश्चय कर आयेंगे?’’

‘‘मैं यत्न करूँगा कि महाराज सुबल की कन्या गान्धारी से आपके पुत्र का विवाह निश्चित हो जाये। यदि यह सम्बन्ध स्वीकार हो गया तो आज से पाँच वर्ग पश्चात् विवाह का निर्णय करूँगा।’’

‘‘राजमाता का कहना है कि आप यह कार्य न तो करना चाहते है और न ही कर सकेंगे। केवल अपनी नौकरी बनाये रखने के लिए यह प्रलोभन उपस्थित कर रहे हैं।’’

मैं मुस्कराकर चुप हो रहा। इस पर महारानीजी ने पूछ लिया, ‘‘संजयजी! अन्धे की सन्तान क्या अन्धी नहीं होगी?’’

‘‘यह आवश्यक नहीं। माता-पिता का स्वभाव, चरित्र और बुद्धि तो सन्तान में जाती है, परन्तु शरीर की विकृति उत्तराधिकार में जानी आवश्यक नहीं।’’

‘‘धृतराष्ट्र तो जन्म से अन्धा है न?’’

‘‘यह तो अब देखने की बात है।’’

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