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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘और कुमार! तुम क्या समझते हो?’’
‘‘मेरी माँ कहती थी कि आप जाने से पूर्व उनसे मिलकर जाएँ।’’
‘‘क्या काम है उसको मेरे साथ?’’
‘‘यह तो मैं नहीं जानता। मेरे विवाह के विषय में ही कुछ कहती होंगी।’’
‘‘तुम क्या चाहते हो कुमार?’’
‘‘विवाह के विषय में? गुरुजी! विवाह तो मेरा होना ही चाहिए। अभी से वह निमनिया दासी मुझको आलिंगन कर मेरा मुख चूमती है तो...गुरुजी! विवाह की इच्छा होती ही है।’’
मैं यह बात सुन अवाक् रह गया। धृतराष्ट्र मुझको चुप देख विस्मय से मेरी ओर देख पूछने लगा, ‘‘आप चुप क्यों हो गये हैं गुरुजी?’’
‘‘यह निमनिया और क्या कहती है?’’
‘‘कहती है कि यही विवाह में किया जाता है। मैं तो कुछ जानता नहीं। इस पर भी गुरुजी, कुछ बहुत ही अच्छा समझ में आता है।’’
मुझको निमनिया पर क्रोध चढ़ आया। इस पर भी पहले मैंने यही उचित समझा कि कुमार को समझाऊँ। मैंने उसको इस विषय में वैज्ञानिक परिचय दिया और फिर बताया, ‘‘निमनिया मूर्ख है। वह तुमको वैसे ही मार डालेगी, जैसे तुम्हारे पिता महाराज विचित्रवीर्य छोटी अवस्था में ऐसा करने से मृत्यु के ग्रास बन गये थे।’’
‘‘विवाह के समय वे कितनी आयु के थे?’’
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