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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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मेरे हस्तिनापुर पहुँचते ही पुनः कुमार अध्ययन के लिए मेरे पास आने लगे। धृतराष्ट्र मेरे सहानुभूति पूर्ण व्यवहार से मुझको बहुत प्रसन्न था और वह समझता था कि मैं ही वहाँ उसका सबसे बड़ा हितैषी हूँ। पांडु मेरा मान करता था। और विदुर मुझको अपने बराबर का मानकर व्यवहार करता था। इस पर भी सब मुझसे अत्यन्त सन्तुष्ट थे।
एक दिन धतराष्ट्र ने पूछ लिया, ‘‘गुरुजी! आप गान्धार-यात्रा पर कब जा रहे हैं?’’
‘‘जब आज्ञा होगी कुमार! तभी जा सकूँगा।’’
‘‘कल राजमाता कह रही थीं कि आप मेरे विवाह के प्रबन्ध के लिए वहाँ जायेंगे।’’
‘‘हाँ, लड़की के पिता गान्धार-राज मान नहीं रहे। उनको मनाने के लिए ही मुझको जान पड़ेगा।’’
‘‘तो वे मान जायेंगे क्या?’’
‘‘यत्न करूँगा!’’
‘‘आप यत्न करेंगे तो वे अवश्य मान जायेंगे।’’
‘‘यह राजमाता कहती हैं क्या?’’
‘‘नहीं, वह समझती हैं कि आप उनको धोखा देना चाहते है।’’
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