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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘कुछ भी हो महाराज! मैं तो हस्तिनापुर में गणराज्य की स्थापना के लिए कह रहा था।’’
‘‘यदि वे मान जाते तो कुरु-राज्य टूक-टूक होकर अनेक राज्यों में विभक्त हो जाता। भारत में कोई भी सम्राट् न रहता और पुनः दानव भारत पर आक्रमण कर इसे अपने अधीन करने का यत्न करते। उस अवस्था में हमारे देवलोक की नीति में भी एक मोड़ आता, जी हम पसन्द नहीं करते।’’
अब मैंने बात बदल दी। मैंने पूछा, ‘‘श्रीमान्! मुझको कैसे स्मरण किया है?’’
‘‘हाँ, दस वर्ष पूर्व आप यहाँ आए थे। यहाँ एक नौ वर्ष की बालिका अपने पिता के दर्शन के लिए लालायित है।’’
‘‘कौन है वह? और उसका पिता कौन है?’’
‘‘हमने उसको बुलाया है।’’ इतना कह सुरराज ने संकेत किया। कुछ ही क्षण में उर्मिला, जिसका दूसरी बार देवलोक में आने पर मैंने चित्र बनाया था, अपने साथ एक अति सुन्दर कन्या लिये हुए वहाँ आई। मैं उस लड़की को देख पहचान गया। उसकी आँखें और मस्तक मुझसे सर्वथा मिलता था। उसको देख मैंने कहा, ‘‘देखा है महाराज! और समझ गया हूँ। एक दुर्बलता के क्षण से यह हुआ है। मैं क्या कर सकता हूँ इसके लिए?’’
‘‘यह लड़की अपने पिता के प्रेम की भूखी है।’’
‘‘परन्तु यहाँ देवलोक में तो माता-पिता का ज्ञान नहीं कराया जाता। फिर यह कैसे हो गया है?’’
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